June 25, 2021

वृतांत – Vritaant

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शनि स्तोत्र (Dashrath krit shani stotra / Stuti): दशरथ जी ने कैसे दूर किया शनिदेव का दोष अपनी कुंडली से त्रेतायुग में

Dashrath krit shani stotra,शनि स्तोत्र, वृतांत - Vritaant

दशरथकृत शनि स्तोत्र (Dashrath Krit Shani Stotra / Stuti)

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते।।

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्घविद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:।।

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत।
एवं स्तुतस्तद सौरिग्र्रहराजो महाबल:।।

दशरथकृत शनि स्तोत्र (Dashrath Krit Shani Stotra / Stuti) की महिमा-

वृतांत  एक बार इक्ष्वाकु वंश के महाराज दशरथ अपने कुलगुरू ऋषि वशिष्ठ से भेंट करने के लिए उनके पास गए महर्षि को परेशान देख उन्होंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि शनिदेव रोहिणी नक्षत्र का भेदन करने जा रहे हैं जिसके करें 12 वर्ष तक वर्षा का होना असम्भव है तभी दशरथ शनि देव पर आक्रमण के लिए चल दिए जैसे ही शनि लोक के निकट पहुंचे शनि देव की दृष्टि उन पर पड़ी जिसके प्रभाव से उनका रथ भस्म हो गया और वह धरती की ओर गिरने लगे भगवान जटायु आकाश में विचरण कर रहे थे तो उन्होंने महाराज को आपने पंखों पर सहारा दिया मूर्छा खुलने पर दशरथ ने उनको आभार व्यक्त किया और दोनों में मित्रता हो गई। दशरथ ने पुनः शनिदेव से युद्ध में असफल होने पर उनकी स्तुति की, जिसके पाठ से जन्म कुंडली में शनिदेव के कुप्रभावों को कम किया जा सकता है शनि देव प्रसन्न होकर जातक को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

शनि देव ने प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार रोहिणी नक्षत्र भेदं नहीं किया। दशरथ ने जटायु से अपनी प्राण रक्षा के बदले कुछ मांगने की प्रार्थना की तब जटायु ने कहा महाराज मेरे कोई संतान नहीं है आप मुझे अपना प्रथम पुत्र दे दीजिए दशरथ ने स्वीकार किया और संतान होने पर अपना वचन पूरा करने को कहा

जब श्री राम का जन्म हुआ तो दशरथ ने अपना वचन पूर्ण करने हेतु जटायु को निमंत्रण दिया तब जटायु बहुत वृद्ध हो गए थे तो उन्होंने असमर्थता प्रकट करते हुए कहा महाराज मैं संतान का पालन नहीं कर सकता आप मेरे पुत्र को धरोहर के रूप में अपने पास रख लीजिए और उन्होंने प्रस्थान किया।

माता सीता के हरण के समय भगवान जटायु ने अपनी पितृ वधू की रक्षा हेतु रावण से युद्ध किया जिसके कारण जटायु मरणासन्न हो गए और श्री राम को माता सीता की सूचना देने के बाद श्री राम के सामने है उन्होंने प्राण त्याग दिए
तब भगवान श्री राम ने अपना पुत्र धर्म निभाते हुए उनका अंतिम संस्कार किया जबकि महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार भरत जी ने किया।
यही कारण था भगवान श्री राम द्वारा जटायु का अंतिम संस्कार करने का, क्योंकि वह उनके पिता थे।

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