July 29, 2021

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Indian Navy Day विशेष: क्यों खास है भारतीय नौसेना, पड़ोसियों से क्या अलग है देश के बेड़े में

Indian Navy Day 4 December Special detail study.

जय हे हिन्द कीनौसेना

भारतीय थल सेना और वायुसेना के बारे में लोग बहुत कुछ जानते हैं क्योंकि दोनों की ही कहानियां गौरव और पराक्रम से भरी हैं। परन्तु नौसेना के बारे में बहुत कम जानकारी सार्वजानिक रूप से उपलब्ध है और कहीं न कहीं लोगो का इस कारण इसके बारे में जानने में रूचि भी थोड़ी कम है। कम जानकारियों की एक वजह ये भी है की विश्व के अधिकतर देशों के पास तो नौसेना ही नहीं है क्योंकि वो एक लैंड लॉक्ड कंट्री हैं। इस वजह से इस क्षेत्र में सीमित विकास की संभावनाएं हैं, परन्तु आज आप कुछ ऐसे घटनाक्रमों के बारे में जानेंगे जो न सिर्फ आपका ज्ञानवर्धन करेंगे बल्कि आपकी नौसेना के प्रति रूचि भी बढ़ाएंगे।

नौसेना को अगर विभाजित करें या उसके प्रमुख अंग अथवा हथियार देखें तो वो एयरक्राफ्ट कैरियर्स, पनडुब्बियां, वेसल्स (विभिन्न जहाज जैसे की फ्रिगेट्स डेस्ट्रॉयर्स इत्यादि) और लड़ाकू विमान।

विश्व में नौसेना :-

विश्व में 200 से भी अधिक देश हैं, अमेरिका द्वारा मान्यता 251 देशों को है परन्तु संयुक्त राष्ट्र के द्वारा मान्यता प्राप्त देशों की संख्या 195 है, हालाँकि ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स की 138 देशों की सूची में 110 देश हैं जिनके पास नौसेना की शक्ति है, अर्थात 110 देश किसी न किसी नेवल वेसल का उपयोग करते हैं।

जहाँ तक एयरक्राफ्ट कैरियर्स की बात है वो केवल गिने चुने और शक्तिशाली देशों के पास ही है, 2020 में जिसे ऑपरेट करने वाले देशों की संख्या 13 है। इनमें हेलिकैरियर्स भी शामिल हैं जिनसे केवल हेलिकॉप्टर्स और “शार्ट टेकऑफ एंड वर्टिकल लैंडिंग” विमान ऑपरेट कर सकते हैं। डेस्ट्रॉयर्स वाले 12 देश हैं। पनडुब्बियां लगभग अधिकतर देशों के पास है, और ऐसे 41 देश हैं, हालाँकि सिर्फ 6 ही देश हैं जिनके पास परमाणु पनडुब्बी है। फ्रिगेट 54, कोर्वेट 39, और माइन वारफेयर की वेसल्स 55 देशों के पास है।

आज के समय में एक ताकतवर नौसेना उसे ही माना जायेगा जिसके पास अधिक संख्या में और आधुनिक जंगी बड़े हों। जिनमें एयरक्राफ्ट कैरियर्स हों जिनसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान ऑपरेट कर सकें, घातक डेस्ट्रॉयर्स हों, फ्रिगेट्स, कोर्वेट्स तथा पनडुब्बियां हों। एक जंगी बेडा अथवा बैटलग्रुप ऐसे ही वेसल्स से मिलकर बनता है, और ऐसे बड़े में 1 एयरक्राफ्ट कैरियर होता है जिसके साथ कुछ डेस्ट्रॉयर्स, फ्रिगेट्स और कुछ पनडुब्बियां।

एयरक्राफ्ट कैरियर v/s पनडुब्बियां:-

एक शक्तिशाली देश के नौसेनिक बड़े में वैसे तो अनेक प्रकार की वेसल्स होती हैं परन्तु पनडुब्बियां किसी भी नौसेना का बहुत ही शांत मगर घातक हथियार होता है। बात है 2005 की, अमेरिकी नेवी की शान 1,00,000 टन का एयरक्राफ्ट कैरियर रोनाल्ड रीगन अपने पूरे बैटल ग्रुप के साथ जिसमें शामिल थे कई डेस्ट्रॉयर्स, फ्रिगेट्स और कॉर्वेट्स, मुकाबला है एक नेवल एक्सरसाइज़ में स्वीडिश नेवी की गॉटलैंड क्लास की 1400 टन की छोटी सी सबमरीन से। ये सबमरीन चुपके-चुपके, बेहद ही शान्ति से बैटलग्रुप के डिफेन्स के बीच से निकलते हुए, एयरक्राफ्ट कैरियर के पास पहुंचकर उसकी कुछ तस्वीरें लेती है और अपना पॉइंट रखती है की इस फोटोग्राफ की जगह टॉरपीडो हो सकते थे, और रोनाल्ड रीगन टाइटेनिक बन सकता था। तो इस घटना से  लेते हुए उस पनडुब्बी को अपने पास रखा और उससे बचाव करने के तरीके और तकनीक विकसित की। आज सभी जानते हैं की सबसे ज्यादा एयरक्राफ्ट कैरियर अमेरिका के पास हैं, और उसे नार्थ कोरिया और रूस की पनडुब्बियों से चुनौती मिल सकती है। एक छोटी सी सबमरीन अरबों रुपयों के एयरक्राफ्ट कैरियर जिसपर दर्जनों लड़ाकू विमान हैं, को बड़ी आसानी से डुबो सकती है। इसलिए अमेरिका ने पनडुब्बियों की भी संख्या बढ़ाई और आधुनिक किया।

शक्ति प्रदर्शन के लिए एयरक्राफ्ट कैरियर एक शक्तिशाली हथियार है, किसी देश के तट के पास 30-60 लड़ाकू विमानों से लैस विमानवाहक पोत खड़ा हो जाये तो ये उस देश के लिए गंभीर संकट है क्योंकि अधिकतर देशों के पास तो वायुसेना में 2 दर्जन लड़ाकू विमान भी नहीं होते। पनडुब्बियां इनका एक कारगर जवाब है, इसलिए ये अन्य तरह के जहाज के लिए भी एक बड़ा खतरा है। अमेरिका (20 एयरक्राफ्ट कैरियर, 66 पनडुब्बियां) के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी रूस के पास अब सिर्फ 1 एयरक्राफ्ट कैरियर है, वहीँ पनडुब्बियों की संख्या 62 है। चीन के पास फिलहाल 2  एयरक्राफ्ट कैरियर और 74 पनडुब्बियां हैं। अर्थात, दोनों के एयरक्राफ्ट कैरियर मिलाकर मात्र 3 हैं वहीँ पनडुब्बियां 136 है जो की अमेरिका से दुगनी है। इसके अलावा नॉर्थ कोरिया कुल 83 पनडुब्बियों के साथ पहले स्थान पर है सर्वाधिक पनडुब्बियों के मामले में।

भारतीय नौसेना:-

अब हमारे प्यारे भारत की बात, भारत के पास 1 एयरक्राफ्ट कैरियर है, 1 निर्माणाधीन है, हालाँकि आवश्यकता 3 की है।

11 डेस्ट्रॉयर्स, 13 फ्रिगेट्स, 23 कॉर्वेट्स हैं। इसके अलावा सपोर्ट शिप्स जैसे की टैंकर्स, मालवाहक जहाज, पनडुब्बियां, पेट्रोलिंग जहाज इत्यादि मिलाकर कुल संख्या फिलहाल 285 है। कुल संख्या के आधार पर हमारा स्थान 9वां है।

पनडुब्बियों की बात करें तो कुल 17 पनडुब्बियां हैं, जिनमें 3 परमाणु पनडुब्बी है और 14 परंपरागत पनडुब्बी है।

परमाणु पनडुब्बी:-

परमाणु पनडुब्बी परमाणु ऊर्जा से चलती है, जो उन्हें परमाणु रिएक्टर से मिलती है। और किसी भी परंपरागत पनडुब्बी के मुकाबले बहुत लम्बे समय तक पानी के अंदर रह सकती है। इसमें कूलेंट होता है जो रिएक्टर को ठंडा रखने के लिए इसके आसपास घूमता है जिससे नॉइस पैदा होता है। परमाणु पनडुब्बियां आकर में विशालकाय होती हैं ताकि लम्बी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अर्थात ICBM (इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) से लैस की जा सकें, सबमरीन से दागे जा सकने की क्षमता के कारण इन्हें SLBM (सबमरीन लांच बैलिस्टिक मिसाइल) कहा जाता है।

ये 2 प्रकार की होती हैं:-

  1. SSN = Submersible Ship Nuclear, ये आकार में परंपरागत पनडुब्बियों से बड़ी होती हैं मगर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल से लैस नहीं होती, क्योंकि इनका प्रयोग अटैक रोल में होता है, जिस प्रकार परंपरागत पनडुब्बियों का होता है इसलिए इन्हें न्यूक्लियर अटैक सबमरीन कहा जाता है। इन्हें आप परंपरागत पनडुब्बियों का एडवांस वर्जन कह सकते हैं क्योंकि ये लगभग असीमित रेंज देती है अर्थात पानी के अंदर दीर्घ काल तक रह सकती है, हालांकि इसे भोजन इत्यादि सप्लाई के लिए ऊपर आना ही पड़ेगा इसलिए रेंज सप्लाई लाइन पर निर्भर करेगी। ज्यादा गहराई में जा सकती है और ज्यादा संख्या में मिसाइलें, टॉरपीडो और माइंस ले जा सकती हैं। भारत के पास ऐसी 1 पनडुब्बी है अकुला क्लास की INS चक्रा।
  2. SSBN = Submersible Ship Ballistic Missile Nuclear, ये परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल्स से लैस होती है। इनका प्रमुख कार्य न्यूक्लियर ट्रायड बनाना है ताकि देश को सेकंड स्ट्राइक कैपेब्लिटी प्रदान की जाये। ये भी परंपरागत (conventional) पनडुब्बियों से बड़ी होती हैं, क्योंकि बैलिस्टिक मिसाइल्स लम्बाई और चौड़ाई में बहुत ज़्यादा विशाल होती हैं। और लम्बे मिशंस के लिए सबसे उचित होती हैं। परमाणु /बैलिस्टिक मिसाइल की तैनाती जमीन पर कहाँ की गई है ये पता लगा कर नष्ट की जा सकती है। परन्तु SSBN पानी के अंदर कहीं भी हो सकती है। भारत के पास ऐसी 2 पनडुब्बी है अरिहंत क्लास की INS अरिहंत और INS अरिघात। अरिहंत 2016 में शामिल कर ली गई थी, अरिघात वैसे तो नवंबर-2017 में पानी में उतार दी गई थी, फ़िलहाल अपने समुद्री ट्रायल्स में है।

ins arihant

परंपरागत पनडुब्बी:-

परंपरागत पनडुब्बियां डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन होती है, ये परमाणु पनडुब्बियों के मुकाबले काफी शांत होती हैं। डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां बैटरी से चलती हैं। एक डीजल जनरेटर इनको चार्ज करता है। इसे हवा की आवश्यकता होती है इसलिए इन्हें पानी के ऊपर आना पड़ता है। इसलिए ये अधिक समय तक पानी के नीचे नहीं रह सकती है। और एंटी सबमरीन जहाज और विमान इन्हें निशाना बना सकते हैं जैसे की P8i पोसाइडन आदि।

भारतीय नौसेना 2020 और आगामी भविष्य:-

  • एंटी सबमरीन कॉर्वेट INS कवरत्ती को 22-10-2020 को कमीशन(शामिल) कर लिया गया है। ये कमोर्ता क्लास की, प्रोजेक्ट 28 अंतर्गत बनाई गई एक स्टील्थ कॉर्वेट है।
  • पनडुब्बी INS करंज 2020 के अंत तक शामिल हो जाएगी। ये स्कॉर्पीन क्लास की परंपरागत डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन है।
  • INS अरिघात को 2020 में ही शामिल किया जाना है और ये गोपनीय होगा, शायद पता ही न चले की ये कब हुआ। इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती है क्योंकि ये एक SSBN प्रोजेक्ट है और ऐसे प्रोजेक्ट बहुत ही महंगे तथा सामरिक दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील होते हैं।
  • अब 2020 को ख़त्म होने में मात्र महीनाभर शेष हैं, परन्तु DRDO जिस गति से धुआंधार मिसाइल टेस्ट कर रहा है, उस हिसाब से अनुमान लगाया जा सकता है की कुछ मिसाइलों को भी शामिल कर लिया जाए। फिलहाल SMART टारपीडो का भी सफल परीक्षण हुआ है।
  • फ्रिगेट हिमगिरि, उदयगिरि, तरागिरि, विन्ध्यगिरि का निर्माण शुरू हो चुका है सभी 2025 तक शामिल कर लिए जायेंगे। नीलगिरि 2022 में बनकर शामिल हो सकता है।
  • पनडुब्बी INS वेला भी जल्द ही शामिल की जाएगी।
  • भारत को भविष्य में 4 हेलिकॉप्टर कैरियर मिलेंगे।
  • प्रोजेक्ट 18 नेक्स्ट जनरेशन डेस्ट्रॉयर्स बनाये जायेंगे जिनपर रेल गन जैसे अत्याधुनिक हथियार लगाए जा सकते हैं।
  • नौसेना को 24 MH-60R रोमिओ हेलिकॉप्टर मिलेंगे।
  • सिंधुघोष क्लास की 3 पनडुब्बियों के अपग्रेड के साथ 3 कीलो क्लास की पनडुब्बियां 1.8 बिलियन डॉलर्स में, जो की एक अच्छी डील हो सकती है। क्योंकि इसमें समय भी कम लगेगा और डिलीवरी जल्दी की जा सकेगी।
  • माइक्रो सबमरीन्स जिसे मार्कोस कमांडोज़ के स्पेशल मिशन के लिए प्रस्तावित किया गया है, जिसमें 8 से 24 कमांडोज़ अपने हथियारों के साथ मिशन पर जा सकते हैं, ऐसी 2 माइक्रो सबमरीन के निर्माण की जिम्मेदारी हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड को दी गई है जिसकी लागत 2000 करोड़ रूपये हो सकती है। निर्माण के बाद ऐसी पनडुब्बियों के और भी आर्डर दिए जा सकते हैं।
  • स्टील्थ 5वीं पीढ़ी के AMCA लड़ाकू विमान भी नेवी के लिए बनाये का विचार है।
  • नेवी के लिए MQ-9 रीपर ड्रोन भी लिए जायेंगे जिसकी डील दिसंबर तक फाइनल की जा सकती है।
  • अंडर वाटर ड्रोन्स- “अदम्य” और “अमोघ” जिसे L&T बना रही है, क्योंकि ये कंपनी परमाणु पनडुब्बी निर्माण के प्रोग्राम से जुडी है जिसके कारण इन्हें अब इस क्षेत्र में अच्छा ख़ासा अनुभव प्राप्त हो चुका है, को खरीदा जा सकता है। आत्मनिर्भर भारत के लिए जो वीडियो कॉन्फ्रेंस की गई थी उसमें वर्तमान रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह जी के पीछे लगे पोस्टर पर “अंडरवाटर ऑटोनोमस व्हीकल” लिखा था, अर्थात इसके ऑर्डर्स की प्रबल संभावनाएं हैं।

दिव्यांश शर्मा, जयपुर
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार

समस्त जानकारी लेखक की अपनी रिसर्च पर आधारित है वृतांत इस लेख से जुड़े किसी तथ्य पर कोई दावा पेश नहीं करता है।

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