June 25, 2021

वृतांत – Vritaant

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पुस्तक समीक्षा: छबीला रंगबाज़ (Chhabila Rangbaaz) का शहर अलग, मौसम सुहाना – अरुण मिश्रा

छबीला रंगबाज़ Chhabila Rangbaaz Praveen Kumar Arun mishra, वृतांत - Vritaant
हाल ही में समकालीन लेखक प्रवीण कुमार (Author Praveen Kumar) का लिखा हुआ यह कहानी संग्रह पढ़ा। टाइटल काफ़ी आकर्षक था और साथ में लेखक की शैली और कहानियां भी ज़रा हटके। सच कहूं तो मैं इसे कहानी संग्रह भी नहीं कहना चाहता हूं, वास्तव में ये लघु उपन्यास जैसी कहानियां हैं, दो कहानियां काफ़ी लंबी और खुद में बहुत कुछ समेटे हुए हैं। अन्य दो कहनियां लम्बाई में ज़रूर कम हैं लेकिन विषयों के मामले में भरपूर। आईये इन कहानियों से रूबरू होते हैं। 
पुस्तक समीक्षा
अरुण मिश्रा की कलम से
कहानी संग्रह :- छबीला रंगबाज़
लेखक :- प्रवीण कुमार
प्रकाशन :- राजपाल एंड सन्स
 
पहली कहानी :- छबीला रंगबाज़ का शहर
 
कौन है छबीला ? शहर कौन सा है ये ? रंगबाज का क्या अर्थ है? अन्य शहरों से ये शहर अलग क्यों है? इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने के मार्फत मैं पहली कहानी में घुस गया। छबीला छोटे शहर का एक नौजवान है, हिन्दी पट्टी (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि) के किसी भी छोटे शहर की तरह यहां की समस्याओं का कोई अंत नहीं है। कहानी में यह शहर बिहार राज्य में है और सन सत्तावन की प्रथम क्रांति के वीर सेनानी बाबू कुंवर सिंह का गढ़ है। यहां लोकल मीडिया है जो सनसनी फैलाने के लिए किसी भी हद तक जाने/गिरने को तैयार बैठा है। नेता, मीडिया, अफ़सरशाही मिलकर जनता को गुमराह करने में तुले हुए हैं। यहीं पर जैन संस्था द्वारा स्थापित एक महाविद्यालय है जहां एक नौजवान हिन्दी भाषा पढ़ाने आता है। ख़ुद को अध्यापक कहता है और अपने सुलझे हुए व्यक्तित्व को इस शहर में बड़ा उलझता हुआ पाता है। फ़िर भी शहर के रंग ढंग में ख़ुद को ढालने की पुरजोर कोशिश में जुट जाता है। एक स्थानीय पत्रकार महोदय से दोस्ती होती है और एक अन्य स्थानीय पत्रकार महोदया से इश्क़। इधर दूसरी तरफ़ शहर में छबीला सिंह एक कुख्यात अपराधी बनकर उभरता है। छबीला और उसके जैसे जाने कितने नौजवान बीच बाज़ार में कट्टा (देसी बंदूक) लेकर खुलेआम सड़कों पर मोटसाइकिल दौड़ा रहे हैं। शहर में वैसे तो आधुनिकता के नाम पर एक मॉल भी बन गया है पर व्यापारी वर्ग को अभी भी रंगबाजी टैक्स (सुरक्षा हेतु सप्ताह) देना पड़ रहा है। कहानी में जाति संघर्ष का भी एक एंगल है, शायद इसके बिना किसी भी छोटे शहर की कोई भी दास्तान पूरी नहीं हो सकती। छबीला जैसे रंगबाज़ का हिंदी के अध्यापक से क्या वास्ता और इनका सामना कैसे होता है? लेखक मार्केज को पसंद करने वाले राजभाषा के अध्यापक महोदय की दोस्ती और मोहब्बत क्या मुकम्मल होगी ? ये तो आपको कहानी पढ़कर ही पता चलेगा। कहानी में बहुत से पात्र हैं और पृष्ठभूमि में सबका अपना एक अतीत और वर्तमान है। पर इसकी वज़ह से कहानी में पाठक की रुचि बराबर बनी रहती है। कहानी की रफ्तार भी मुझे पसन्द आयी।
 
दूसरी कहानी :- लादेन ओझा की हसरतें
 
गांव के आसपास बसा हुआ एक शहर जहां आज भी गांव और शहर का संघर्ष बदस्तूर जारी है। गांव के लोग हर सुबह झुण्ड के झुण्ड शहर की तरफ़ रोज़ी रोटी कमाने आते हैं और फ़िर शाम को वापस अपने बसेरे की तरफ़ लौट जाते हैं। इसी गांव के निवासी हैं लादेन ओझा और इक़बाल मियाँ ,दोनों के मज़हब भले ही अलग हों पर दोस्ती एकदम प्रगाढ़। इक़बाल की अम्मी ओझा जी की सलामती के लिए उनको तावीज पहनाती हैं और इक़बाल मियाँ अगर ओझा जी के घर आ टपके तो श्रीमती ओझा उनको बिना खाये जाने नहीं देती हैं। इक़बाल मियाँ को एक और तलब है, गांजा पीने की, इसी के नशे में ही उन्होंने ओझा जी का नाम भी बिगाड़ा था। वैसे तो ये तलब गाँव के और बहुत से सोहदों को भी है लेकिन इस चक्कर में सब इक़बाल के लिए परेशान हैं। इधर दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी लादेन अमेरिका के हत्थे चढ़ जाता है और उधर शहर के उबलते हुए खून में और उबाल आने लगता है। ओझा जी और इक़बाल मियाँ की दोस्ती किस और जायेगी ये तो आपको कहानी पढ़कर ही पता लगेगा। पहली कहानी के सामने ये कहानी थोड़ी हल्की लगी। यहाँ निर्बाध रूप से सिमट रहे गाँव के चरित्र के साथ ही गंगा जमुनी तहज़ीब, धार्मिक कट्टरता आदि के मसलों को लेखक ने अपनी लेखनी से ज्वलंत किया है।
 
तीसरी कहानी :- नया ज़फ़रनामा
 
जबरदस्त कहानी, संग्रह की मेरी सबसे प्रिय कहानी है यह, इस कहानी का मुख्य पात्र एक अनाथ लड़का, मौजू है । मौजू के पास संपत्ति के नाम पर एक बूढ़ी बीमार मां है जिसने उस अनाथ को पाला पोशा और उसी बुढ़िया की एक बेटी। मौजू को लीडर कहलाना अच्छा लगता है, मुझे लगता है खाली बैठने के अतिरिक्त नेतागिरी करना हमारे समाज का सबसे प्रिय टाइम पास है। जिसको देखो वही नेता बनने को बेताब है, जनसेवा की इस चाहत का क्या कहना। ख़ैर, बस्ती कचरे के एक पहाड़ के नजदीक बसी हुई है और बीचोबीच एक तालाब है। तालाब भील जाति के कुछ वृद्ध लोगों के लिए आस्था का केंद्र है , वहीं कचरे के पहाड़ की वजह से बस्ती में कई बीमारियों, समस्याओं और निरंतर एक गंध का डेरा बन जाता है। ग़रीबी की आड़ में बस्ती में अशिक्षा है और जवान लड़कियों को जिस्मफरोशी के अंधे कुएं में धकेलने की एक सुगठित योजना है। आगामी खेलों के लिए झील के पास वाली ज़मीन पर एक भव्य स्टेडियम बनाने की भी योजना है जिससे बस्ती के एक हिस्से को पुनर्वासित करना पड़ेगा, इस बात का अनुचित लाभ उठाकर एक एनजीओ अपना उल्लू सीधा करने दाख़िल होता है। नेता, मिडिया, पुलिस, एनजीओ, डॉक्टर, इस कहानी में ऐसा कोई वर्ग नहीं जिसे बख्शा गया हो, एक दृश्य में तो मीडिया का एक रिपोर्टर सनसनीखेज़ खबर सूंघता हुआ बस्ती में दाखिल होता है और फ़िर किस तरह से वो बस्ती वालों को घेर कर उनसे सवाल करता है , उन्हें एक तरह से धमकाता है, वो आज के संदर्भ में एकदम सटीक बैठता है। लेखक ने ऐसे कई प्रसंग कहानी में इस्तेमाल किये हैं, कहानी की भाषा ने मुझे खासतौर पर अपनी तरफ़ खींचा, ये उपमाएं देखिये :-
“स्वप्न को नींद आने लगी। उसे बहुत काम है कल। पर स्मृति को नींद कहाँ। वह खाँसते हुए उठी। अपनी देह की फटी चादर स्मृति ने स्वप्न के शरीर पर डाल दी। स्वप्न सोने लगा। स्मृति ज़मीन टटोलते हुए बस्ती की ओर बढ़ गयी, “आत्माएँ रक्षा करें स्वप्न की।”
बस्ती का भविष्य क्या होगा , स्टेडियम का रास्ता किस तरफ़ से निकलेगा? मौजू की नियति क्या है, यह आपको कहानी पढ़कर ही पता चलेगा।
 
चौथी कहानी :- चिल्लैक्स! लीलाधारी
 
शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या रखा है? हमारी कहानी के नायक बाबू अष्टभुजा (एबी) सिंह ने इसे चरितार्थ कर दिखाया। उनके अनेक नाम हैं, कोई एबी कहता है, कोई पिंकी, कोई लडडू गोपाल और जाने क्या क्या । गोरे चिट्टे एबी बाबू दिल्ली के सरकारी विभाग में मुलाजिम हैं और अपनी पसंद की हुई एक बंगाली कन्या के मोहपाश में फंसे हुए हैं। आप कहेंगे यह तो अच्छी बात है, इस में समस्या क्या है? समस्या हैं एबी के पिताजी जो गांव पर रहते हैं और अपनी जाति पर खूब घमंड करते हैं। बचपन से अब तक हर कदम पर एबी को उन्होंने अपमानित किया है, लताड़ा है और एक पुत्र जैसा स्नेह तो बिल्कुल भी नहीं किया है। बालक एबी के मनोभावों को समझने वाले गुरुजी तक का अपमान किया था ठाकुर इश्वरीलाल सिंह ने , इस से आहत होकर युवा एबी बागी हो गया है। एबी के बचपन के किस्से बड़े रोचक हैं, किस तरह वो एक मिशनरी स्कूल में पढ़ने जाता है, एक ईसाई लड़के का गहरा दोस्त बनता है और स्कूल में खूब तिकड़मबाजी करता है। सच में दो पीढ़ियों के बीच में किस तरह के अंतर उभरते हैं, बच्चों को दोस्त बनाना कितना ज़रूरी है और एक कुत्सित मानसिकता कि लड़के या मर्द को विशेष रूप से कैसा बर्ताव करना चाहिए, इस कहानी में बख़ूबी उभरकर सामने आये हैं। कहानी सरल है, समकालीन है और कई जगहों पर मुझे भी एबी बाबू के बागी रवैये और नए तेवर पर गर्व महसूस हुआ।
 
इस किताब की सभी कहानियां रोजमर्रा की होने वाली घटनाओं के बीच से ही निकलती हैं। ऐसी घटनाएं जो जब घटित होती हैं तो सनसनीखेज़ खबरें जरूर बनती हैं लेकिन पब्लिक की याददाश्त से धीरे धीरे ये निकल जाती हैं और फ़िर सब इन अप्रिय घटनाओं के दोबारा होने का इंतज़ार मात्र करते हैं। लेखन की शैली मौलिक है, कहानियों की भाषा सरल अपितु शुद्ध है। वैसे तो मैंने पहली बार प्रवीण कुमार जी को पढ़ा है पर इनकी और कहानियां ढूंढ कर पढ़ने की इच्छा है।

 

अरुण मिश्रा 

पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर, फ़िलहाल जर्मनी में कार्यरत।
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