June 18, 2021

वृतांत – Vritaant

खबर, संवाद और साहित्य

उत्तराखंड तबाही और ग्लेशियर टूटने के बारे में वह सब कुछ, जो आपको जानना चाहिए

उत्तराखंड तबाही,उत्तराखंड तबाही 2021, वृतांत - Vritaant

उत्तराखंड को मुख्यतः दो हिस्सों में देखा जाता है पहला: गढ़वाल जिसमे छोटा चार धाम के मुख्य मंदिर सम्मिलित हैं दूसरा कुमाऊं जो कैलाश या नेपाल से जुड़ता क्षेत्र है। दोनों क्षेत्रों की खूबसूरती का कोई मुकाबला नहीं। जाड़े के दिनों में पहाड़ों में बर्फ़बारी का दौर अमूमन जारी रहता है जो कि उत्तर भारत के बाकि क्षेत्रों में ठण्ड बढ़ने का कारण भी है। रविवार की सुबह भी बाकि दिनों की भाँती थोड़ा जाड़ा और खिली धूप लेकर निकली थी। लेकिन लोगों को कहाँ जानकारी थी कि एक जानलेवा सैलाब भी उनकी ओर आने वाला है जो पलक झपकते ही सब तबाह कर जायेगा। यह बात है उत्तराखंड में गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले की जिसके नागरिकों को और वहाँ कार्य कर रहे देश के विभिन्न भागों के इंजीनियरों व मज़दूरों को तबाही की कीमत चुकानी पड़ी। यह तबाही आखिर क्यों और कैसे हुई आइये इसके बारे में जानते हैं।

असल में क्या घटित हुआ?

पर्यावरणविदों के अनुसार नंदादेवी ग्लेशियर का लटकता हुआ हिस्सा टूटा और अचानक से ऋषिगंगा नदी में बाढ़ आ गई। ग्लेशियल झील भी टूटने का अनुमान है परन्तु अभी इसकी पुष्टि नहीं की गई है। बचाव कार्यों की समाप्ति के पश्चात् सरकार द्वारा गठित एक टीम नंदादेवी क्षेत्र में जाकर इस पर अध्ययन करेगी उसके पश्चात् ही तस्वीर साफ़ होगी।

ग्लेशियर टूटने की क्या वजह रही होगी?

हिमालय को उन पर्वत श्रंखलाओं में गिना जाता है जो अभी भी अपना निर्माण कर रही है अर्थात अपना स्थान पक्का कर रही है। इससे यह समझा जा सकता है कि यह अभी भी नाज़ुक स्थिति में है। यही कारण है कि इसकी मुख्य चोटियों की ऊँचाई भी बढ़ रही है। फिलहाल पर्यावरण विदों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय क्षेत्र के तापमान में भारी बदलाव देखे जा रहे हैं।

फ़रवरी माह में रात का तापमान -5 डिग्री सेल्सियस तो दिन का तापमान +5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। इसका अर्थ है एक ही दिन में 10 डिग्री का उतार चढ़ाव देखा गया है। अतः यह माना जा रहा है कि रात में तेजी से जमने वाली बर्फ दिन के वक़्त उसी तेजी से पिघल भी रही है। एक ठोस ग्लेशियर बनने के लिए लगातार एक अनुकूल जलवायु का होना आवश्यक होता है जो कि नहीं मिल पा रही है। कमजोर ग्लेशियर होने के कारण इस प्रकार की घटनाएं बार-बार देखने को मिल सकती है। यह फिलहाल पर्यावरणविदों या हिमालय पर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का अनुमान है।

गढ़वाल क्षेत्र के ऊंचे यानी ऊपरी क्षेत्र में कई परियोजनाएं चल रही हैं जिनमे कुछ बाँध एवं मुख्यतः चार धाम हाईवे परियोजना है। चमोली जिले के तपोवन क्षेत्र में पन-बिजली परियोजना पर कार्य चल रहा है। पन बिजली परियोजना उत्तराखंड के दूर से दूर स्थित क्षेत्र में बिजली पहुंचाने के उद्देश्य के लिए लगाया जा रहा है। इस परियोजना के तहत ऋषिगंगा नदी पर बाँध बनाया गया है तथा उसके नज़दीक पहाड़ों में कई सौ मीटर लम्बी सुरंगें भी बनाई गई है ताकि नदी के बहाव को मोड़ कर नदी पर परियोजना का कार्य सुचारु रखा जा सके।

ऋषिगंगा के समान ही इससे जुड़ने वाली नदी धौलीगंगा पर भी तपोवन पन बिजली परियोजना का कार्य चल रहा है। ऋषिगंगा पर चल रही इस परियोजना का स्थानीय नागरिकों द्वारा कई बार विरोध किया गया है। गाँव के ही एक सोशल एक्टिविस्ट कुंदन सिंह द्वारा हाईकोर्ट में PIL भी दाखिल की गई है जिस पर सुनवाई जारी है।

चार-धाम राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना कैसे इस तबाही से जुड़ी मानी जा रही है?

गढ़वाल क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय के मेगा प्रोजेक्ट चार-धाम हाईवे पर भी कार्य जारी है। है यह प्रोजेक्ट गढ़वाल के छोटे चार धाम के नाम से देशभर में प्रसिद्ध गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ व केदारनाथ जाने वाले यात्रियों के लिए सहूलियत की दृष्टि से बनाया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के शुरू होने से पूर्व तक यहाँ केवल सिंगल सड़क थी जो काफी संकरी थी। अब सड़क की चौड़ाई इतनी की जा रही है कि सड़क 2 लेन या उससे अधिक की हो जाए।

इसके लिए पहाड़ काटे जा रहे हैं और पत्थरों को तोड़ने यानी कि स्टोन क्रशिंग के संयत्र लगाए गए हैं। स्थानीय व्यक्तियों के अनुसार इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को काफी हानि हो रही है। पहाड़ों को बड़ी-बड़ी मशीनों से काटा जा रहा है एवं पत्थरों को तोड़ा जा रहा है। यह मशीनें भारी स्तर का कंपन लगातार पैदा कर रही है। लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि सड़क परियोजना के इस कार्य को पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति कैसे मिली होगी?

कैसे मिली चार धाम हाईवे परियोजना की अनुमति?

एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय ने 889 किमी व 12000 करोड़ की लागत से बनने वाले हाईवे के बड़े हिस्से को 53 छोटे-छोटे सड़क निर्माण कार्यों में तब्दील कर दिया है। इससे यह हुआ कि environment impact assessment के नियमों के मुताबिक इस परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी है।

अब कैसी है स्थिति?

ITBP, NDRF एवं SDRF ने मिलकर संयुक्त अभियान चलाया जिसके तहत बचाव कार्य जारी हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री श्री अमित शाह ने इस घटना का संज्ञान लिया है और सभी प्रकार के प्रयास किये जाने के लिए देश को जनता को सुनिश्चित किया है। उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार एवं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी घटना का जायजा लिया है एवं बचाव कार्य तेजी से किया जा रहा है। बचाव कार्यों में मुख्यतः सुरंगों में फंसे व्यक्तियों को निकाला जा रहा है। विभिन्न न्यूज नेटवर्कों के अनुसार तक़रीबन 170 लोगों के लापता होने का अनुमान है। लेकिन लोगों को ज़िंदा भी निकाला जा रहा है।