September 26, 2021

वृतांत – Vritaant

खबर, संवाद और साहित्य

बचपन की कल्पनाओं में देखे गाँवों जैसा है मुनस्यारी – Beautiful Himalayan Hamlet Munsyari

Munsyari Village

जब छोटे थे तब एक तरह का चित्र जो अधिकतर हम बनाया करते थे। एक झोपड़ीनुमा घर जिसके पीछे पहाड़ जहाँ से नदी निकलती है। वो सुन्दर कल्पना मानों सच हो गयी हो जब मैं मुनस्यारी पहुंचा। पूरा यात्रा वृतांत बताता हूँ। मैं, मनोज और अरुण जयपुर की झुलसाती गर्मी से कहीं दूर जाना चाहते थे। हमने कहीं दूर किसी ठंडी जगह पर जाने का प्लान बनाया। ठंडी जगह का सीधा अर्थ है हिमालय।

रानीखेत एक्सप्रेस में काठगोदाम और आगे अल्मोड़ा तक का सफर

देखते ही देखते अगले 3-4 दिनों के भीतर हम रानीखेत एक्सप्रेस में बैठे ताश की पत्तियां पीट रहे थे। दोपहर के ढ़ाई बजे जयपुर से निकली ट्रैन शाम को दिल्ली पहुंची। अब हमें केवल रात्रि का समय सोकर गुज़ारना था। तक़रीबन 5 बजे मुझे और मनोज को अरुण ने जगाया। ट्रैन एक स्टेशन पर रुकी थी। अभी पूरी तरह उजाला नहीं हुआ था। यात्री उतर रहे थे। उन्होंने बताया की आखिरी स्टॉप यानी की काठगोदाम बस 15 मिनट की दूरी पर है। हम ट्रैन से उतरने को तैयार थे। एक अजीब ख़ुशी हमारे भीतर उछल रही थी। सुबह के उजाले में काठगोदाम स्टेशन की खूबसूरती मन को शांत कर रही थी। हम तीनों ने स्टेशन के बाहर चाय पी और अल्मोड़ा के लिए बस पकड़ ली। पहाड़ों पर बादल अपना डेरा जमाये थे। बस पहाड़ों पर अटे बादलों से बीच होकर गुजरती तो धुंध जैसा प्रतीत होता।

A Himalayan Valley

इतने ऊंचे पहाड़ हमने पहली बार देखे थे। मन घबरा रहा था की कहीं बस का पहिया सड़क से नीचे ना चला जाए। कुछ ही देर में हम तीनों को चक्कर आने लगे थे। पीछे बैठे एक दो यात्री खिड़की से बाहर उल्टी करने लगे जिसे देखकर कंडक्टर चिल्लाया और आगे की सीट पर आकर बैठने को कहने लगा। हमने भी मौका पाकर आगे की सीटें पकड़ी। पहाड़ों के बेहद सुन्दर नज़ारे अब बस के सामने वाले शीशे से दिखाई दे रहे थे, ये अद्भुत थे। काठगोदाम से अल्मोड़ा की 80 किमी की दूरी तय करने में बस को तक़रीबन चार घंटे लगे। अल्मोड़ा पहाड़ों में बसा एक बड़ा शहर है जहाँ दूर-दूर तक पहाड़ों पर बादल पसरे थे। छिटपुट बारिश भी लगातार जारी थी। गर्मी का नामोनिशान नहीं था।

हमने KMVN की एक होटल में कमरा ले लिया। थोड़ा आराम करने के बाद हम भूख से बिलबिला उठे इसलिए बाहर बाज़ार में जाकर कुछ खाने का फैसला लिया लेकिन बारिश शुरू होने के कारण जा नहीं पाए। होटल में ही हमने चाय और ऑमलेट खा लिया। शाम होते-होते बारिश थम गई। हम बाजार में घूमने निकले। यहाँ का लाल बाज़ार आस-पास के गाँवों में बड़ा प्रसिद्द है। मैंने बेडु पाको बार मासा वाला गाना भी सुना था। उसमे इस बाज़ार का जिक्र किया गया था अतः मैं यह बाजार घूमने के लिए काफी उत्सुक था। हमने बाज़ार से रेनकोट ख़रीदे। मोमोज़ की दुकानों पर भीड़ लगी थी। गरमा-गरम भाप निकलते मोमोज़ देखकर हमसे रहा नहीं गया। 2 प्लेट मोमोज़ चटकाकर हमने सूप पिया। इसके बाद हम आराम से घूमते हुए हम होटल पहुंचे जहाँ से सुबह जल्दी हम मुनस्यारी के लिए आगे बढ़ गए।

Ramganga, River

हमें निकलने में देर हो चुकी थी इसलिए अब मुनस्यारी के लिए सिर्फ प्राइवेट टैक्सी उपलब्ध थी। किसी ने हमें बताया की थल नाम की जगह तक हम सवारी गाड़ी में जा सकते हैं। एक महिंद्रा मैक्स में हमें बीच की सीट मिल गयी और फिर से शुरू हो चुका था पहाड़ों में घूमने का सफ़र। छोटे-छोटे बेहद खूबसूरत गाँवों में रूकती गाड़ी जिसमें बज रहे पहाड़ी गीत मन को भा रहे थे। आज मौसम खुला था। दूर पहाड़ों पर बादल जमे थे लेकिन धूप-छाँव का खेल भी जारी था। बादलों से छनकर पहाड़ों पर गिरती धूप मानों लाडले बालक को माँ अपने आँचल में छुपाने की कोशिश कर रही हो। सीढ़ीनुमा खेत किसी चित्रकारी से कम नहीं थे। सच में प्रकृति की चित्रकारी देखकर ही मनुष्य ने चित्रकारी सीखी होगी।

यहाँ हर एक पहाड़ पर एक छोटा गाँव था। हर गुजरते गाँव में कहीं ना कहीं मुझे अपना सपनों का घर दिखाई देता। मैं जैसे अपने बचपन में लौट रहा था। मैं सोचने लगा की मैं यहाँ पैदा क्यों नहीं हुआ। करीब आधे रास्ते हम तीनों ने नोटिस किया की हम तीनों ही कहीं खोये थे। सुहाने सफर की शाम हुई और अब हमने थल में एक होटल में कमरा लिया। होटल के बिलकुल पीछे एक खूबसूरत नदी बह रही थी। अभी सूर्यास्त में समय था इसलिए होटल के बगल से नीचे उतरते एक मार्ग से हम नदी किनारे पहुँच गए। नदी अपनी मौज में बह रही थी। हम किनारे-किनारे कुछ दूर तक टहलते रहे। हमने फोटो खींचे और कुछ एक वीडियोज़ भी बनाई। ढलती शाम के साथ पहाड़ पर बने घरों की रोशनियां जुगनुओं की तरह चमकने लगी थी। मैंने मजाक करते हुए कहा की शाम को शेर नदी पर पानी पीने ज़रूर आता होगा। यह सुनते ही मनोज और अरुण जो नदी किनारे पत्थरों पर शांत बैठे थे तुरंत उठ खड़े हुए। देर रात हम तीनों बालकनी में खड़े नदी के शोर में मगन होकर गप हांकते रहे।

Dangerous roads of Munsyari

सुबह 8 बजे तक़रीबन हम बिना नहाये मुनस्यारी के लिए निकल चुके थे। हम और अधिक ऊंचे पहाड़ों में दाखिल हो रहे थे। तक़रीबन 10 बजे थे, अचानक से हमें ज़ोर से पानी की आवाज सुनाई देने लगी। टैक्सी वाले से हमने पूछा तो उसने बताया की आगे बिरथी फॉल है उसकी आवाज है। हमने उसे वहीं उतार देने के लिए कहा। बिरथी फॉल हमारे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। इतना विशाल झरना हम तीनों ने पहली बार देखा था। बिरथी फॉल स्टैंड पर दो छोटी दुकानें भी थी। जिनके बगल से सीढ़ियां बिरथी तक जाने के लिए बनाई गयी थी। कुछ ऊँचाई पर चढ़ने के बाद इसे करीब से देख पाये। यह अत्यधिक विशाल था। पानी की फुहार दूर तक फ़ैल रही थी।

वहीं नज़दीक बनी एक छोटी टंकी में जहाँ पानी लगातार एक पाइप से आ रहा था और नीचे की ओर बह रहा था। हम तीनों नहा-धोकर तैयार हुए और खूब फोटोज़ खींचे। हम तीनों के अलावा वहाँ कोई नहीं था। करीब 2-3 घंटे बिता कर हम नीचे लौटे। दोनों दुकानों में एक दूकान एक आंटी और अंकल चला रहे थे। उन्होंने हमें भरपेट भोजन खिलाया। आंटी बड़े प्यार से हमें खाना परोस रही थी मानों हम उनके यहाँ मेहमान हों। हमने जब खाने की कीमत पूछी तो हम दंग रह गए। आंटी ने हमें कहा की यदि हमारे पास पैसे नहीं तो कोई बात नहीं हम भूखे नहीं रहें। आंटी की बात सुनकर खाना खाते हुए हम तीनों ने एक दूसरे को देखा और शहर को याद किया जहाँ मनुष्य एक दूसरे को लूट लेने को उतारू रहता है।

Birthi Fall, Munsyari

अब समस्या यह थी की हमें यहाँ से मुनस्यारी के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा था। आंटी हमें लगातार सांत्वना दे रही थी की चिंता मत करो कुछ ना कुछ जरूर मिल जायेगा। ज्यादा इंतज़ार नहीं करते हुए हम एक ट्रक में सवार हो गए। बिरथी के आगे की घाटियां बेहद विशाल थी। जो ट्रक के शीशे से और भी खतरनाक दिखाई दे रही थी। मनोज और अरुण दोनों ने अपनी आँखें बंद कर ली थी। मुझे तो लग रहा था की यदि यह ट्रक कहीं गिर जाता है तो जैसे मैं हमेशा के लिए यहाँ बस जाऊंगा। इसलिए मुझे वह घाटियां बेहद सुहा रही थी। देवदार के पेड़ों से भरे जंगल एक अलग दुनिया का आभास करवा रहे थे। मनोज और अरुण ने जैसे ही आँखें खोली, उन्होंने तुरंत ट्रक से उतरने की बात कही। अब हम तीनों एक सुनसान सड़क पर किसी दूसरी गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन शुक्र है हमें कुछ ही देर में मुनस्यारी के लिए एक गाड़ी मिल गयी। मुनस्यारी पहुँचते हुए हलकी बारिश ने हमारा स्वागत किया। मोड़ से दिखाई देता इंद्रधनुष स्वर्ग के द्वार सा प्रतीत हो रहा था। आगे बढ़ते हुए बादलों के बीच हमने कुछ बर्फ से ढंकी पहाड़ियाँ देखी। हमने ऐसी पहाड़ियां जीवन में पहली बार देखी थी। उनकी ऊँचाई बादलों से भी अधिक थी।

Nanda Devi temple at Munsyari
Nanda Devi temple at Munsyari

आख़िरकार हम मुनस्यारी पहुँच चुके थे। हमें गाड़ी के ड्राइवर ने बताया की खलिया टॉप और नंदा देवी मंदिर मुनस्यारी की वो ख़ास जगहें हैं जहाँ जाने के लिए लोग विदेशों से भी आते हैं। मुनस्यारी मिलम और नंदा देवी जैसे ट्रेक्स पर जाने वालों के लिए पहला पड़ाव माना जाता है। मुनस्यारी बचपन के सपनों में आने वाले एक खूबसूरत गाँव जैसा था। एक छोटा प्यारा गाँव जहाँ हर कोई खुश दिखाई देता और मुस्कुराकर बात करता। हमने एक कमरा दो दिनों किराये पर ले लिया। खलिया बहुत ऊँचाई पर था इसलिए हम वहाँ तो नहीं गए लेकिन उसके नीचे के जंगलों और घास के मैदानों में हमने पूरा दिन बिताया। एक पानी की बोतल को हमने वहाँ बहते पानी से भरकर कई बार अपनी प्यास बुझाई। हम कुछ बिस्किट्स और नमकीन वगैरह लेकर निकले थे। लेकिन पूरा कचरा हमने अपने एक बैग में ही रखा। शाम से पहले हम नंदा देवी के मंदिर गए जो इस दुनिया का शायद सबसे खूबसूरत मंदिर होगा। ये यात्रा मेरे जीवन की सबसे सुन्दर यात्राओं में से एक थी।

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