August 3, 2021

वृतांत – Vritaant

खबर, संवाद और साहित्य

उत्तराखंड का पंचाचूली पर्वत और दारमा घाटी हिमालय में छुपे एक स्वर्ग जैसे Yatra Vritant :Panchachuli Peaks & Darma Valley

Panchachuli Peaks from Darma Valley

Yatra Vritant:

पंचाचूली की मंजिल में जयपुर से हल्द्वानी का सफर

दिसम्बर माह और कड़ाके की ठण्ड। लेकिन हम पूरी तैयारी के साथ निकले थे। सुनहरी धूप और ठंडी हवा में गौते खाते मैं और मेरा दोस्त मनोज रॉयल एनफील्ड पर मस्त धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। कभी किसी चाय की थड़ी पर चाय का आनंद लेते तो कभी किसी ढ़ाबे पर सेव टमाटर का। मस्ती से आगे बढ़ते हुए हमें लगने लगा कि हम एक दिन में हल्द्वानी नहीं पहुँच पाएंगे। क्योंकि रात्रि को मोटरसाइकिल चलाने का हमारा बिलकुल मन नहीं था। हम इस यात्रा को एक बोझ नहीं बनाना चाहते थे इसलिए इसे हमने छुट्टियां मनाने के हिसाब से देखा।

मुक्तेश्वर से दिखाई देती हिमालय की बर्फीली चोटियां

पहली शाम को हमने दिल्ली पार की और हापुड़ के आस-पास कहीं एक होटल में रात बिताई। दिल्ली की जहरीली हवा दूर-दूर तक अपना असर दिखाती है, इस बात का अंदाज़ा हमें नहीं था। हमें घुटन जैसी महसूस हो रही थी इसलिए हम सुबह जल्दी ही होटल से निकल गए। हापुड़ से हल्द्वानी तक का सफ़र भी हमने उसी अंदाज में पूरा किया जैसा शुरू किया था। एक दो होटल देखने के बाद हल्द्वानी मार्केट में हमें हमारे हिसाब की होटल मिल गयी। यहाँ खाना उपलब्ध नहीं था तो ढूंढते हुए कुछ दूर हम ढ़ाबे पर खाने लगे। उस ढाबे का नाम तो मुझे याद नहीं परन्तु उसका खाना हम शायद ही भूल पाएंगे।

Panchachuli Peaks & Darma Valley Yatra Vritant

मुक्तेश्वर में बिस्किट खाकर सोने की नौबत आई

हल्द्वानी में ठण्ड थोड़ी ज्यादा दी। गर्म पानी से सुबह नहा कर हम आगे की ओर बढ़ चुके थे। हल्द्वानी-काठगोदाम कुमाऊं हिमालय का प्रवेशद्वार माना जाता है। भीमताल होते हुए हम मुक्तेश्वर की ओर आगे बढ़ रहे थे। रॉयल एनफील्ड पर पहाड़ों में सैर करना मानों ठंडी हवा के झौंको में हम झूला झूल रहे थे। हिमालय की हवा इतनी शुद्ध होती है की फेफड़े मारे ख़ुशी के फूल कर डबल हो जाया करते हैं। हम वादियों को नज़ारों को अपनी आँखों और मोबाइल में कैद करते हुए आगे बढ़ रहे थे। मुक्तेश्वर उत्तराखंड का वह क्षेत्र है जो तराई क्षेत्र से बहुत दूर ना होते हुए भी इतनी ऊँचाई पर है की नंदा देवी और नंदा कोट जैसी ऊंची बर्फ से ढंकी पहाड़ियां यहाँ से बेहद मनमोहक दिखाई देती हैं।

हम बहुत धीरे आगे बढ़ रहे थे और मुक्तेश्वर क्षेत्र की सुंदरता ने हमें वहीं रोक लिया। हमने आज का दिन धानाचूली में रुकने का फैसला लिया। धानाचूली से सनसेट देखने के बाद हम रुकने का बंदोबस्त देखने लगे। बमुश्किल हमें एक गेस्ट हाउस मिला जहाँ खाना खाने का बंदोबस्त नहीं था। शाम के 7 बज चुके थे और हम ज़ोरों की भूख से लगभग बेहाल थे। धानाचूली चौराहे पर जाकर हम मालूम पड़ा की अब वहाँ कोई ढाबा खुला नहीं है। कोरोना के चलते पर्यटकों की कमी और दिसम्बर की ठण्ड इसका मुख्य कारण था। हमारे पास एक आखिरी खुली दूकान से बिस्किट या पैक्ड केक वगैरह लेने के अलावा कोई चारा नहीं था।

हिमालय की गोद में धारचूला से दुग्तू गाँव जाती सड़क का दृश्य

दिनभर की ख़ुशी में अब ज़रा मायूसी घुली थी। लेकिन हिमालय हमें इस तरह मायूस नहीं देखना चाहता होगा इसलिए हम इसे उसी की लीला कहते हैं। उस शाम जब हम गेस्ट हाउस पर लौटे तो पास के मकान से एक दीदी जिन्होंने हमें रूम दिखाया था, हमारी भूख का हालचाल पूछने पहुंची। उसे जैसे ही पता चला की हमने खाना नहीं खाया है। अपने घर से मैगी और ऑमलेट बनाकर हमारे लिए ले आई। पहाड़ पर रहने वाले लोग भी पहाड़ के समान ही विशाल ह्रदय अपने भीतर समेटे हुए हैं यह बात भी हमें मालूम हुई। खैर अगले दिन हम धारचूला के लिए निकले वादियों में खोते हुए हमें पता ही नहीं चला कब शाम हो गयी और धारचूला अभी भी 60 किमी दूर था। लेकिन हमने धारचूला पहुँचने की ठान ली थी अतः हम अँधेरे में भी चलते रहे कुछ-कुछ देर में आती-जाती गाड़ियाँ हमारा हौसला बढ़ा रही थी।

दुग्तू गाँव और दारमा घाटी ऐसी की वर्षों तक आँखों में जीवंत रहने वाली है

आख़िरकार 9 बजे हम धारचूला पहुंचे धारचूला नेपाल बॉर्डर पर स्थित एक पहाड़ी क़स्बा है। काली नदी के इस ओर भारत है तो दूसरी ओर नेपाल। हमें केवल 700 रूपये में कमरा मिल गया। होटलकर्मी एक अच्छा इंसान लग रहा था। होटलकर्मी से दुग्तु जाने के बारे में हमने रात को ही पूछताछ कर लेना ठीक समझा। होटलकर्मी ने हमें पूछा की वहाँ कैसे जायेंगे उसका मतलब साधन से था। जब हमने उसे बताया की हम अपनी रॉयल एनफील्ड पर आये हैं तो उसका जवाब एकदम जोश भर देने वाला था। उसने कहा की ये तो दुग्तू क्या सीधे पंचाचुली पहुंचेगी। फिर क्या था अपना सामान होटल में छोड़ हम सुबह 8 बजे रवाना हुए।

धारचूला से दुग्तु के नज़ारे अब तक की कुल हिमालय यात्रा से एकदम भिन्न थे। रास्ता जान हलक में ला देने वाला था। लेकिन हम दुग्तु पहुँचने को बेताब हुए जा रहे थे। धारचूला से दुग्तु मात्र 78 किमी दूर है परन्तु हमें वहाँ पहुँचने में 6 घंटे लगे। आप इससे रास्ते की कठिनाइयों का अंदाजा लगा सकते हैं। बड़ी-बड़ी लाल पहाड़ियाँ और उनमे बसे 3 छोटे-छोटे गाँव बेहद खुबसूरत लग रहे थे। दुग्तु के अलावा दान्तु और मिलम गाँव भी वहीँ बसे थे। दुग्तु गाँव में अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर हमने पैदल-पैदल पान्चाचुली बेस कैंप के लिए चढ़ाई शुरू कर दी।

दुग्तू के रास्ते विशाल पहाड़ियाँ और तलहटी में बहती नदी का मनोरम दृश्य

हम रास्ता भटक ना जायें इसलिए गाँव से एक माँ-बाउजी की उम्र का कपल भी हमारे साथ चलने लगा। कुछ 3 किमी चढ़ाई के बाद हम बेस कैंप पहुंचे विशाल पंचाचूली का नज़ारा अद्भुत था। शाम होते-होते ठण्ड बेहद अधिक बढ़ चुकी थी। कैंप में खाने ठहरने की उत्तम व्यवस्था थी। जो की उतनी ज्यादा खर्चीली नहीं थी। कैंप चलाने वाले व्यक्ति ने हमारे लिए आग का बंदोबस्त कर दिया था। हमें अगले दिन पंचाचूली 0 पॉइंट घूमकर धारचूला के लिए वापस निकलना था। सुबह जब हम कैंप से बाहर निकले तब सब कुछ जम चुका था। बाहर टोंटी में पानी बर्फ बन चुका था। पारा माइनस में रहा होगा।

सूरज की पहली किरण पंचाचूली के मस्तक को सोने सा चमका रही थी। हमने कंपकंपाते हुए ही ट्रेक करने का निर्णय लिया। सच में हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड थी। हमारा शरीर अकड़ रहा था और सांस फूल रही थी। कुछ देर में सूरज की किरणें हम तक पहुंची। सूरज की किरणों ने हममें एक नई ऊर्जा का प्रसार किया। कुछ देर हम गर्म घास में लेटे धूप का आनंद लेते रहे। दूर-दूर तक कोई नहीं था। सामने विशाल पंचाचूली से बर्फ के टूटकर गिरने की आवाजें किसी बादल की गरजना से कम नहीं थी। दारमा वैली की सुन्दरता शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। यह हिमालय के किसी भी क्षेत्र से बहुत अलग है।

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