June 25, 2021

वृतांत – Vritaant

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विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर जो समृद्ध हिमालय की गोद में बसा है – Chopta Chandrashila Trek

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Chopta Valley

यायावर निकले अपना झोला लेकर

मनोज लगभग मना कर चुका था। लेकिन जब मैंने और शालू ने सिंधी कैंप से बस में बैठकर कॉल किया तो उससे रहा नहीं गया। उसने कहा जब तक बस कुंडा स्टैंड पहुँचती है मैं बैग लेकर वहीं मिलता हूँ। यह सुनकर मैं और शालू खुश हुए। हमने एक सीट उसके लिए भी बुक कर ली। सिंधी कैंप से कुंडा की दूरी तय करने में बस को लगभग आधा घंटे से ज्यादा लगने वाला था। रात्रि के लगभग 10.30 बजे बस कुंडा स्टैंड पहुंची। मनोज से बताया की वह घर वालों से झगड़कर आया है। बस अगले दिन सुबह 10 बजे हमें ऋषिकेश छोड़ने वाली थी। यह पहाड़ों की हमारी पहली यात्रा थी। दरअसल मैंने इंटरनेट पर एक पोस्ट देखी थी जिसमें लिखा था- “चोपटा – भारत का स्विट्ज़रलैंड”

Chopta Valley

मैंने उन्हें चोपता की फोटो दिखाई तो दोनों को विश्वास नहीं हुआ। भला ऐसी भी कोई जगह भारत में हो सकती है। यह भारत में इंटरनेट के लगभग शुरूआती दिन थे। सुबह-सुबह ऋषिकेश में बारिश हो रही थी। हमने पहुँचते ही सबसे पहले एक कमरा किराये पर लिया। हम तैयार होते तब तक बारिश थम चुकी थी। हम तीनों घूमते हुए लक्ष्मण झूला पहुंचे। विशाल गंगा और उसका रौद्र स्वरुप हम तीनों ने पहली बार देखा। लक्ष्मण झूला और घाट घूमते हुए हमने पूरा दिन वहीं बिताया। गंगा किनारे बैठकर लगातार पानी के प्रवाह को देखना एकदम अलग अनुभव था। मानों जीवन का सार समझा रहा है।

ऋषिकेश से पहाड़ों के बीच बसे छोटे से गाँव ‘सारी’ तक का सफरनामा

अगले दिन हमें बहुत दूर जाना था। सुबह साढ़े छः बजे हमने केदारनाथ जाने वाली बस पकड़ी। हमें केदारनाथ के बारे में बस इतनी ही जानकारी थी कि वह बहुत दूर है, हम वहाँ नहीं जा सकते। बस अपनी मौज में चल रही थी। बस में हमें एक अंकल मिले जो केदारनाथ जा रहे थे। उन्होंने देवानंद वाली टोपी पहनी थी। अंकल ने हमें बताया कि जरुरी नहीं यह बस आज ही केदारनाथ पहुंचे। यह जहाँ तक पहुंचेगी यात्रियों को वहीं विश्राम करना पड़ेगा। चोपटा के बारे में अंकल ने हमारा मार्गदर्शन किया। उन्होंने हमें बताया की हमें उखीमठ उतरना होगा। वहाँ से चोपटा के लिए हमें टैक्सी पकड़नी होगी। चोपटा बहुत ऊँचाई पर है। वहाँ विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है जो पंचकेदार में से एक है।

पतली सड़क पर घाटियों में घूमती बस के विपरीत बह रही नदी का दृश्य बार-बार खिड़की से बाहर झाँकने को विवश करता। बस देवप्रयाग पहुंची, जहाँ पहाड़ी के दो ओर से दो अलग-अलग नदियाँ आकर मिल रही थी। अंकल ने हमें बताया कि बाईं और से आने वाली नदी भागीरथी है व दाईं और से आने वाली अलकनंदा है। यहीं से गंगा अपना मूल स्वरुप प्राप्त करती है। बस चलती रही और अंकल अपने जीवन अनुभव साझा करते रहे। उन्होंने महाभारत की कई कहानियाँ हमें सुनाई जो उत्तराखंड के इतिहास के साथ जुड़ी हैं।

चारों और पहाड़ियों पर बादलों ने अपने डेरा जमाया था। कहानियों में खोते हुए हम बाहर से आ रहे ठन्डे झौंकों को अपने भीतर सोंख रहे थे। बस छोटे-छोटे गाँवों में रूकती और आगे बढ़ जाती। कुछ घंटों बाद बस रुद्रप्रयाग पहुंची। यहाँ भी दो नदियों का संगम था। लोहे से बने विशाल पुल से गुजरती बस और नीचे विशाल नदियों का मिलन, ऐसा नज़ारा देखना हमारे लिए एक असाधारण बात थी। दोनों नदियों का रंग भी अलग-अलग साफ़ दिखाई दे रहा था, मटमैला और नीला। यहाँ एक ओर केदारनाथ से आ रही मन्दाकिनी थी और दूसरी बद्रीनाथ की ओर से आ रही अलकनंदा।

Deoriya Tal

जहाँ-जहाँ बस रूकती मनोज कुछ ना कुछ खाने के लिए ले आता। रास्ता गुज़रता रहा और बस के साथ हम आगे बढ़ते रहे। हम खिड़की के बाहर किसी दृश्य को देखते तो एक-दूसरे को भी दिखाते। प्रकृति के समक्ष ख़ुशी और शांति दोनों का गहरा मन को खुश और शांत कर देता है। अचानक बस रुकी, ड्राइवर ने बस का इंजिन बंद कर दिया। सवारियों में चहल-पहल होने लगी। लम्बा जाम लगा था। अंकल ने हमें बताया कि पहाड़ी से पत्थर गिरने की वजह से रास्ता अक्सर जाम हो जाया करता है। पत्थर को हटाने में कुछ समय लग जाता है। कोई आधे घंटे के इंतज़ार के बाद बस आगे रवाना हुई।

आखिरकार लगभग 2 बजे बस उखीमठ पहुँच चुकी थी। हमने अंकल को अलविदा कहा और आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं दी। उखीमठ से चोपटा जाने के लिए टैक्सी तैयार थी। हमने बीच की सीट पकड़ ली। उखीमठ से चोपटा की यात्रा थोड़ी भिन्न थी। साथ चल रही नदी लुप्त हो चुकी थी। गाड़ी लगातार ऊँचाई की ओर बढ़ रही थी। घाटियों की ऊँचाई से लग रहा था मानों यह सड़क सीधी आसमान में जा रही है। ठंडी हवा के झौंकों से हम सिहरने लगे थे। पहाड़ों से भीनी-भीनी खुशबु आने लगी थी। मोड़ों पर बहते झरनों की संख्या लगातार बढ़ने लगी थी। हम थोड़ा घबरा रहे थे किन्तु गाड़ी का ड्राइवर बखौफ होकर अपनी मस्ती में चला रहा था। वह साथ बैठी महिला से बातें करता हुआ और ठिठोली करता हुआ चल रहा था। वे दोनों बात-बात पर हँस रहे थे। मुझे पहाड़ी भाषा तो समझ नही आ रही थी किंतु मुझे एहसास हुआ कि वे दोनों प्रकृति के बीच पल रहे जीवन का कितना आनंद ले रहे हैं। प्रेम और प्रकृति का कितना मधुर संबंध है।

ड्राइवर ने हमें बताया कि हमें चोपटा के साथ ही देवरिया ताल भी देखनी चाहिए। उसने बताया कि यह एक बेहद खूबसूरत झील है जो काफी ऊंचाई पर स्थित है। हम तीनों ने तय किया कि हम आज की रात देवरिया के लिए रुकेंगे और अगले दिन चोपटा के लिए निकलेंगे। ड्राइवर ने हमें सारी नाम के एक गाँव मे उतार दिया। गाँव के स्टॉप पर ही एक बहुत छोटा और प्यार होमस्टे मिल गया। वहीं अंकल ने अपना एक छोटा सा ढाबा बनाया था। यह चारों से खुला था और पीछे दूर तक फैली वादियों का नज़ारा देखा जा सकता था। पहाड़ों पर टिके बादल सफेद कपास के समान प्रतीत हो रहे थे। हमें ज़ोरों की भूख लगी थी। अंकल ने कुछ ही मिनटों में बन ऑमलेट के साथ चाय परोस दी।

Cobra lili

ढ़ाबे के ठीक सामने से सीढियां देवरिया ताल की ओर जा रही थी। हम तीनों ने ट्रेक करना शुरू कर दिया। ये तकरीबन 1.5 किमी का ट्रैक था इसलिए हमें ज्यादा समय नही लगा। रास्ते में एक नौजवान गरमा गरम पकौड़े तल रहा था। हमने लौटते समय खाने का तय किया। थोड़ा जंगल पार करने पर हम पहाड़ की चोटी पर पहुंचने लगे थे। कुछ चहल-पहल भी सुनाई देने लगी थी। पहुंचने पर देवरिया ताल का जो नज़ारा देखने को मिला वह बयां नही किया जा सकता। एक बड़ी झील के चारों और प्राकृतिक घास और छोटे-छोटे पौधों की भरमार थी और चारों और घना जंगल। कुछ टेंट भी लगे थे जिनमें कुछ कपल और छोटे परिवार अपनी छुट्टियां बिता रहे थे।

मनोज यह अद्भुत नजारा देख पागल जैसा हो गया। हम सभी का मन नृत्य करने लगा था। मनोज और शालू बहुत नौटंकी कर रहे थे। मैंने दोनों की कई तस्वीरें कैमरे में कैद की। घने बादल लग चुके थे और हमें लौटना भी था। हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। हल्की बारिश में भांग की चटनी के साथ भाप निकलते पकौड़ों का स्वाद ऐसा था की उनके बनाये सारे पकोड़े हम चट कर चुके थे। बारिश थमी और हम नीचे लौट आये। रात को बारिश के कारण लाइट नहीं थी अंकल ने बैटरी की रौशनी में हमें खाना खिलाया रात को कड़कती बिजली में हिमालय की वादियाँ बेहद डरावनी महसूस हो रही थी। अगली सुबह हम चोपटा के लिए निकल पड़े।

चोपटा से चंद्रशिला अपने आप में एक पूरी यात्रा है

चोपटा पर कमरा लेकर सबसे पहले हमने अपना सामान रखा। और फिर तुंगनाथ के लिए ट्रेक करना शुरू कर दिया। शुरूआती रास्ते में घना जंगल और चारों ओर बुरांश के पेड़ थे जो लाल फूलों से लदे थे। लेकिन कुछ ही देर में बड़े-बड़े बुग्याल (पहाड़ी घास के मैदान) हमारे सामने थे। ट्रेक के लिए पत्थरों से एक पगडंडी का निर्माण किया गया था। बुरांश के पेड़ रास्ते भर की शोभा बढ़ा रहे थे। छोटे रंग-बिरंगे फूलों की फुलवारी चारों ओर फैली थी। इस नज़ारे को आँखों से देखना बेहद अलग अनुभव था। ऊँचाई की ओर बढ़ता घुमावदार रास्ता पूरी वैली को एक नज़र में भरने के लिए मददगार साबित हो रहा था। अब एक बार फिर बादलों की टोली वहाँ से गुजरने लगी थी। बादलों के आते ही अचानक ठण्ड बढ़ चुकी थी। बादल हमें छूकर तेजी से आगे बढ़ रहे थे। गनीमत है उन्होंने बारिश नहीं की। रास्ते के बीच छोटी दुकानें जिन पर चाय और मेगी का लुत्फ़ हर कोई उठा रहा था। कुछ जगहों पर महिलाएं बुरांश के फूलों से बनी शरबत राहगीरों को पिला रही थी। रास्ते में हमें कोबरा लिली फूल देखने को मिला। यह दिखने में हुबहू कोबरा सांप जैसा था जो भगवान शिव के गले में होता है।

Tunganath Temple

धीरे-धीरे हम मंदिर तक पहुंचे। मंदिर के आस-पास बर्फ जमी थी। हमने जबतक उसे छुआ नहीं हमें विश्वास नहीं हुआ की यह वाकई में बर्फ थी। तुंगनाथ मंदिर की ऊर्जा को आसानी से महसूस किया जा सकता था। यह बहुत पुरानी शैली का मंदिर था जो बेहद खुबसूरत जगह पर स्थित था। मंदिर को फूलों की मालाओं से सजाया गया था। हमें मालूम हुआ की चंद्रशिला नाम की जगह जो यहाँ सबसे ऊँचाई वाला स्थान है, केवल 1 किमी ऊपर था। मंदिर में दर्शन कर बिना देरी किये चंद्रशिला के लिए निकल पड़े। बहुत दूर ऊँचाई पर एक छोटा मंदिर दिखाई दे रहा था। शाम ढलने वाली थी लेकिन कुछ अन्य लोग भी थे जो हमारे साथ आगे बढ़ रहे थे।

Chandrashila Peak

सूर्यदेव अलविदा कह चुके थे लेकिन बादलों के बीच से बिखरती लालिमा ने अभी भी पहाड़ियों पर उजाला किया था। आखिरकार हम चंद्रशिला पहुँचे। यहाँ पहुंचना कोई शिखर फ़तेह कर लेने जैसा था। आस-पास के पहाड़ बुरांश के लाल और सफ़ेद फूलों से ढंके थे। बादलों के भीतर से दूर बर्फ से ढंकी ऊंची पहाड़ियाँ धुंधली दिखाई दे रही थी। यहाँ हवा बेहद ठंडी थी अतः अधिक देर रुकना मुश्किल था। चूँकि अँधेरा धीरे-धीरे बढ़ने लगा था इसलिए वहाँ स्थित एक छोटे मंदिर में माँ गंगा को प्रणाम कर हम वापस लौटे। चोपटा पहुँचते गहन अँधेरा हो चुका था लेकिन लोगों की आवाजाही से हम सुरक्षित नीचे उतर आये। अगले दिन जल्दी सुबह हम पहाड़ियों को अलविदा कहते हुए घर के लिए निकल पड़े।

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