June 25, 2021

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मराठा आरक्षण के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने किया बड़ा फैसला, जानिए क्या निर्णय लिया गया

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महाराष्ट्र में मराठाओ को आरक्षण देने के मामले में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और 5 मई की कोर्ट द्वारा लिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर असहमति जताई। इसके अलावा केंद्र सरकार ने राष्ट्रिय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा नहीं दिए जाने के कारण भी आपत्ति जताई है। यह मामला इसलिए चर्चा में है क्योकि 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण के मामले में बड़ा फैसला सुनाया जिसमे कोर्ट ने मराठा आरक्षण को निरस्त कर दिया और 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को लांघने को समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया। इस फैसले के बाद सरकार ने कोर्ट को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की और कहा कि यह राज्य में नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के उद्देश्य से जातियों को ओबीसी घोषित करने की शक्ति से वंचित करता है। सरकार का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 15 राज्यों को नागरिको के समाजिक और आर्थिक रूप से पहचान करने की अनुमति देता है।

सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायधिशो की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाये गए एक कानून को रद्द कर असंवैधानिक घोषित कर दिया जिसमे मराठा समुदाय को तय सीमा से अधिक आरक्षण का लाभ दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में दिया गया आरक्षण अधिकतम 50 फीसदी सीमा का उललंघन है और यह असंवैधानिक है। पांच जजों की बेंच में से 3 जजों ने कहा कि केवल राष्ट्रपति को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए वर्ग की पहचान करने और प्रकाशित सूचि में शामिल करने का अधिकार है। इन तीन जजों के अनुसार संविधान संशोधन 102 के तहत राज्यों के पास सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए वर्ग की पहचान करने का अधिकार नहीं है जबकि दो अन्य जजों का फैसला इनके विपरीत था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र में कोई भी असाधारण परिस्थितिया या असाधारण स्थिति नहीं थी जिसके महाराष्ट्र सरकार को मराठा समुदाय को आरक्षण देने हेतु 50 प्रतिशत की सीमा को लांघना पड़े। जबकि महाराष्ट्र सरकार का मानना है कि राज्य में पिछड़े वर्ग की जनसँख्या 85 प्रतिशत है और आरक्षण केवल 50 प्रतिशत ऐसे में आरक्षण की सीमा में वृद्धि की जानी चाहिए।

इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय महाराष्ट्र में अग्रगामी वर्ग है और राष्ट्रिय जीवन की मुख्य धारा है ऐसे में यह कोई असाधारण स्थिति नहीं कही जा सकती। केंद्र सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक गंभीर संवैधानिक और संघीय संकट पैदा हो गया है क्योकि भारत में राज्य बहुत पहले से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग की पहचान करने की शक्ति का प्रयोग करते आ रहे है जिसे अब ले लिया गया है। इसी के चलते केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन 102 के तहत इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की है। यदि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर की गयी समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल नहीं पाती है तो फिर केंद्र सरकार को इस मामले को हल करने के लिए एक संविधान संशोधन लाना होगा। इसके अलावा यह फैसला भारत के अन्य राज्यों के विभिन्न समुदायों जैसे जाट आदि के आरक्षण पर भी प्रभाव डालता है।

भारत में पिछले कुछ समय से मराठा आरक्षण का मुद्दा सबसे ज्यादा खबरों में रहा है। इस आरक्षण के विरोध में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा नहीं रही तो समानता के अधिकार का क्या होगा ? देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला बिकुल सही है लेकिन भारत में अक्सर आरक्षण और जातीय मुद्दों पर राजनीती होती आयी है जिसको देखते हुए यह फैसला बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है और इससे अन्य राज्यों पर भी असर पड़ सकता है।

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