June 25, 2021

वृतांत – Vritaant

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आखिर कौन थे विनायक दामोदर दास सावरकर, जानिए वीर सावरकर के बारे में कुछ रोचक तथ्य

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भारत में सबसे विवादित जीवन अगर किसी का रहा है तो वह विनायक दामोदर दास सावरकर का है जिनको हम वीर सावरकर के नाम से भी जानते है। कुछ लोग इन्हे वीर सावरकर कहते है तो कुछ लोग इन्हे कायर सावरकर कहते है। कुछ लोगो के लिए ये जाति को नहीं मानने वाले व्यक्ति थे और कुछ लोग इन्हे हिंदुत्व के नाम पर भड़काने वाला व्यक्ति मानते है। यानि देखा जाये तो वीर सावरकर को भारत में कुछ लोग एक देश भक्त के रूप में देखते है तो कुछ लोग इन्हे देशद्रोही मानते है। आखिर इनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिससे ये लोग लोगो के लिए एक महान व्यक्ति बन गए कुछ लोगो के लिए ये बुरे व्यक्ति बन गए। आज कल लोग सबसे ज्यादा इंटरनेट पर जुड़े हुए है और इंटरनेट पर किसी के बारे में जो भी जानकारी दी गयी होती है लोग उसे ही सच मानने लगते है। ऐसा ही वीर सावरकर के साथ है क्योकि इंटरनेट पर उनसे जुड़े कई सारे विवादास्पद लेख है जो उन्हें उन्हें दो तरह के व्यक्तित्व वाला व्यक्ति बताते है जिससे लोग ऐसे लेखो को पढ़कर वीर सावरकर के बारे में खुद की एक सोच बना लेते है जबकि इतिहास में उनके जीवन में क्या हुआ था और वे किन परिस्तिथियों से गुजरे थे, ये सब लोगो को बिलकुल भी पता नहीं है। लेकिन देखा जाये तो जो लोग जानते है और समझते है उसके विपरीत सत्य कुछ और है जो लोगो को बिलकुल भी ज्ञात नहीं है।

वीर सावरकर यानी विनायक दामोदर दास सावरकर का जन्म 28 मई 1823 को हुआ महाराष्ट्र में हुआ था। वे एक कवी थे और वे मराठी भाषा में कविताये लिखते थे। वे महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण परिवार से थे लेकिन फिर भी हिन्दू धर्म को धर्म नहीं मानते थे। यानि यह बात कुछ लोगो को अटपटी लगे क्योकि एक ब्राह्मण यह मानता है कि हिन्दू कोई धर्म है ही नहीं बल्कि एक भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान है। उनका मानना था कि हिंदुत्व जीवन का एक मार्ग है जबकि धर्म एक पश्चिमी अवधारणा है। वे अपने सभी दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाते थे जिनको निचली जाति का समझा जाता था। उन्होंने महाराष्ट्र में एक मंदिर भी बनवाया जहा पर हर जाति के आ सकते थे। वे अंग्रेजो के शासन के समय के सबसे बड़े मुजरिम थे। अंग्रेज उनके द्वारा उठाये गए हथियार से डरते थे और उनका हथियार कोई बन्दूक नहीं थी बल्कि उन्होंने कलम को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। इसके बाद वीर सावरकर ने अपने जीवन में बहुत सारी चीज़े लिखी जिनमे कई कविताये और किताबे है।

लेकिन इन सभी रचनाओं में बात सिर्फ एक की होती है जो बहुत ही ज्यादा खास होती है। वीर सावरकर जी की सबसे बड़ी रचना उनके द्वारा अंग्रेजो के लिए लिखा गया माफीनामा था। वीर सावरकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग की थी। वे पढ़ाई के दौरान एक बहुत ही तेज और बुद्धिमान छात्र थे। उन्होंने लोदों जाने के लिए छात्रवृति भी मिली थी और उन्होंने वहा से अपनी क़ानूनी डिग्री को पूरा किया। और यही से शुरुवात होती है इंडिया हाउस की। यह अंग्रेजो के खिलाफ उन्ही के घर लंदन में एक राजनितिक दल का केंद्र था। इस दल में मैडम कामा, वि एन चटर्जी, लाला हरदयाल और वीर सावरकर के साथ अन्य स्वतंत्रता सेनानी थे। इस दल में शामिल सभी क्रांतकारी यहाँ पर रहकर इटेलियन और आयरिश क्रांतिकारियों से प्रेरणा लेते थे। वीर सावरकर को महसूस हुआ कि अंग्रेज जनता से तथ्य छिपा रहे है। विनायक ने एक किताब लिखी जिसका नाम ‘द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडन्स 1857’। यह किताब आगे चलकर हर क्रन्तिकारी के लिए एक मार्गदर्शक साबित हुई जिनमे भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद और सुभास चंद्र बोस भी शामिल थे। विनायक भारतीय क्रन्तिकरियो को बंदूकों की पूर्ति भी करते थे। इसके बाद जब उन्हें गिफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेज सरकार ने उन्हें उनके इतिहास में सबसे बुरी सजा दी थी। उन्हें 25 साल की दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी और उन्हें अंदमान की जेल में रखा गया था जहा पर इन पर बहुत ही ज्यादा अत्याचार किया जाता था।

बहुत समय तक जेल में बिताने के बाद विनायक को महसूस हुआ कि अगर वे जेल में ही बंद रहे तो वे देश के लिए कुछ नहीं कर पाएंगे। फिर इसके बाद उन्होंने अंग्रेज साकार को अपने अपने साथियो के लिए माफीनामा लिखा। जेल में भी लोग उनको अपना लीडर मानते थे। वे एक वकील थे और उन्हें अपने अधिकारों के बारे में पता था। उन्होंने कभी भी खुद पर दया नहीं मांगी। उन्होंने जेल से बाहर आने के लिए वो सब कुछ किया जो उन्हें जरुरी समझा। वे केवल खुद के लिए जेल से बाहर नहीं आना चाहते थे बल्कि वे देश की भलाई के लिए जेल से बाहर आना चाहते थे। ऐसे स्वतंत्रता सेनानी को जिनको देश की स्वंत्रता में योगदान देने और भारत के पूर्ण स्वराज की मांग करने के लिए काला पानी की सजा भोगी, अगर ऐसे महान व्यक्ति को लोग कायर समझेंगे तो यह उनके लिए काला पानी की सजा से भी बुरी बात है। जेल में कई यातनाये झेलने के बाद भी वे अपना रोज़ का काम करना नहीं भूलते थे और वो था कविता लिखना। वे वही करते थे जो वे थे। उन्होंने कई महान रचनाये लिखी थी लेकिन लोग उनके बारे में कोई बात नहीं करते। उन्हें केवल उनके द्वारा लिखे गए माफीनामे के बारे में पता है जिसके आधार पर लोग उन्हें देशद्रोही करार दे देते है। जबकि असल में वे सच्चे स्वतंत्रता सेनानी थे।

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