June 25, 2021

वृतांत – Vritaant

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करणी माता मंदिर देशनोक का यात्रा वृतांत – राजस्थान के प्रमुख मंदिर

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हेलो दोस्तों, जैसा कि आप सभी जानते हैं, हमारे भारतवर्ष में सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग में दिव्य शक्तियों ने जन्म लिया हैं। हमारा भारतवर्ष इन दिव्यविभूतियो की ख्याति का गुणगान करते कभी नहीं थकता। भारतवर्ष में कलयुग में भी लोक देवताओं के चमत्कारों से हम भलीभांति वाकिफ है। आज हम जिस अलौकिक दिव्य शक्ति की बात करने जा रहे हैं, उस दिव्य शक्ति का नाम है “माता करणी मां” यह नाम अपने आप में दिव्यता की प्रकाष्ठा है। आइए जानते हैं माता करणी मां के जीवन परिचय और मंदिर वृतांत के बारे में>>>

माता करणी मंदिर वृतांत ( माता करणी मंदिर का यात्रा वृतांत)

भारतवर्ष  में स्थित राज्य राजस्थान के बीकानेर जिले से जोधपुर की तरफ जाने वाले रास्ते पर तकरीबन 30 किलोमीटर की दूर सड़क किनारे और रेल मार्ग के पास देशनोक नामक क्षेत्र पड़ता है। इसी क्षेत्र पर माता करणी का भव्य मंदिर बनाया गया है। इस मंदिर में  माता की मूर्ति विक्रम संवत 1595 में स्थापित की गई थी। यह स्थापना चैत्र शुक्ल चतुर्दशी गुरुवार के दिन हुई थी। बन्ना खाती द्वारा निर्मित माता करणी की मूर्ति जैसलमेर के पीले रंग के पत्थर से बनी हुई है। इस मूर्ति का मुंह लंबोदर है। कानों में कुंडल। हाथ में त्रिशूल। बाएं हाथ में नरमुंड लटक रहा है। वक्षस्थल पर दो लड़ी मोतियों की माला और दोनों हाथों में चूड़ियां धारण की हुई है। इस मंदिर में देश-विदेश से पर्यटक और भक्तों की हमेशा भीड़ जुटी रहती है। इस मंदिर में आने वाला हर एक भगत सबसे पहले मंदिर परिसर में स्वतंत्र घूमने वाले चूहे अर्थात काबों (माता करणी के मंदिर में घूमने वाले चूहों को काबा कहते हैं) के लिए कुछ खाने उपयुक्त प्रसाद जरूर लेकर आते हैं। इस मंदिर में मान्यता है कि अगर किसी के पैर नीचे चूहे की मृत्यु हो गई तो उसे तुरंत चांदी या सोने का चूहा बनाकर मंदिर में भेंट करना पड़ेगा। नहीं तो उन्हें बहुत हानि हो सकती है। ऐसी मान्यताओं के चलते श्रद्धालु यहां पर अपने पैर घसीटते हुए और चूहों की रक्षा मुख्य तौर पर की जाती है।

करणी माता का जीवन परिचय

माता करणी का जन्म 20 सितंबर 1387 को होना इतिहास के पन्नों में उल्लेख मिलता। देवी के पिता का नाम मेहाजी तथा माता का नाम देवल देवी था। माता का जन्म स्थान जोधपुर में स्थित “सुवाप” गांव में हुआ था। करणी माता के पिता मेहाजी किनिया शाखा के चारण थे।उन्हें मेहा मांगलिया द्वारा सुवाप गांव उदक में मिला था। जो कि जोधपुर जिले के फलोदी क्षेत्र में है। इसी गांव में लोक देवी करणी माता का जन्म हुआ था ऐसा माना जाता है।

माता की जन्म कहानी बहुत ही विचित्र और रोचक है। मेहाजी  और देवल देवी के कोई पुत्र नहीं था। केवल 5 पुत्रियाँ ही थी। मेहाजी को कोई पुत्र नहीं होने की वजह से वे हमेशा चिंतित रहते थे। इसी चिंतित अवस्था में उग्र होकर मेहाजी ने माता हिंगलाज मंदिर की यात्रा प्रारंभ कर दी।हिंगलाज माता जो कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र उनका मंदिर स्थित है। माता हिंगलाज उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देती है। तभी मेहाजी ने वरदान स्वरूप अपना सम्मान मांगा। हिंगलाज माता तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गई।

कुछ दिनों बाद देवल देवी को गर्भ हुआ जैसे ही गर्भ का प्रसूति समय निकट आया तो मेहाजी ने मोढ़ी मुलाणी और आख्या इदानी नामक दाई को को देवल देवी की देखरेख में लगा दिया। प्रसूति का समय निकल गया। अर्थात 10 महीने, 12 महीने, 15 महीने, 18 माह बीत जाने के बाद आख्या इदानी ने सोचा पता नहीं कब यह बच्चा जन्म लेगा। मैं यहां ज्यादा नहीं रुक सकती। तो मोढ़ी मुलाणी नामक दाई ने ही देवल देवी की आगे देखरेख जारी रखी। एक दिन सपने में देवल देवी को माता दुर्गा ने साक्षात दर्शन दिए और कहा बेटी तुम सब्र रखो, मैं जल्द ही तुम्हारी कोख से जन्म लूंगी। करीब 21 माह बाद देवल देवी ने एक शिशु को जन्म दिया। जब मेहाजी ने अपनी बहन से पूछा कि क्या हुआ ? लड़का या लड़की। तो बुआ ने गुस्से में तंज कसते हुए कहा कि फिर से पत्थर हुआ, अर्थात फिर से लड़की हुई है। उन्होंने अपनी अंगुलियां अर्थात मुट्ठी भींच कर गुस्से में यह बात कही, तो उनकी सभी पांचों उंगलियां ऐसे कि ऐसे चिपकी रह गई। उन्होंने सोचा शायद मुझे बादी हो गई। परंतु यह देवी का अपमान करने की सजा उन्हें मिल चुकी थी।

जैसे देवल देवी को पता चला कि पुत्री हुई है। तो उसका मन कुछ उदास हुआ परंतु विधि के आगे वह कुछ नहीं कर सकती थी। तीन दिन बाद नामकरण हुआ तो माता का नाम “रीधु बाई” रखा गया। धीरे-धीरे समय बीतता गया और रीधु बाई बड़ी होने लगी। एक दिन रीधु बाई की बुआ पीहर आई हुई थी और वह पांच बहनों में सबसे ज्यादा रीधु बाई को ही ज्यादा प्यार करती थी। एक दिन वह बाई को नहला रही थी। तब एक हाथ अपाहिज होने के कारण वह सही से नहीं नहला पा रही थी। तभी रीधु ने कहा था आप को क्या हो गया? तो बुआ ने कहा मेरा हाथ सही नहीं है। तभी रीधु ने बुआ का हाथ अपने हाथ में लेकर कहां क्या हुआ तुम्हें, झूठ कहती हो तुम्हारा हाथ तो बिल्कुल ठीक है। ऐसा कहकर जैसे ही माता ने उनका हाथ छुआ तो उसका हाथ पुनः स्वस्थ अवस्था में आ गया। यह चमत्कार देख बुआ ने देवल देवी और मेहाजी से कहा कि आप की पुत्री कोई साधारण पुत्री नहीं है। यह कुछ करण वास्ते इस संसार में आई है। तो बुआ ने उसका नाम रीधु बाई से बदलकर “करणी बाई” रख दिया। तब से पूरा गांव इन्हें करणी माता के नाम से जानने लगा और आज यह रीधु बाई संपूर्ण विश्व में करणी माता के नाम से जाने जाने लगी।

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