June 25, 2021

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संत दादू दयाल का जीवन परिचय तथा मंदिर वृतांत – राजस्थान के प्रमुख मंदिर

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संत दादू दयाल का जीवन परिचय तथा मंदिर वृतांत

हेलो दोस्तों, कहते हैं भारतवर्ष सनातन काल से ही विश्व गुरु की उपाधि पर आसीन रहा है। इस अखंडता का मुख्य कारण है, इस पावन धरा पर संतों का आगमन होता रहा है। भारतवर्ष में बहुत ऋषि-मुनियों व संतों ने जन्म लेकर भारत की धारा को संत छाया से कायाकल्प किया है। इसलिए भारत को सोने की चिड़िया के साथ-साथ विश्व गुरु भी कहा जाता है। यहां पर संतों की कृपा से जो शास्त्र, पुराण, ज्ञान के भंडार निर्मित किए गए वह अद्वितीय है। भारत खंड आज ऋषियों व संतो के उपकार को कभी भी नहीं भूल सकता। आज ऐसे ही एक महान संत “श्री दादू दयाल महाराज” के विषय में हम इस लेख में महाराज दादू दयाल के चरणों में नतमस्तक करते हुए जीवन परिचय को सरल शब्दों में प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगे। आइए जानते हैं संत दादू दयाल महाराज के मंदिर यात्रा वृतांत और जीवन परिचय >>>

संत दादू महाराज का मंदिर वृत्तांत

संत दादू महाराज ने अपने जीवन काल में संसार को सांसारिक रीति-रिवाजों, मूर्ति पूजा आदि को अंधविश्वास बताया। उन्होंने अपनी रचना को संसार के कल्याण हेतु गाया इस रचना को “दादू वाणी” के नाम से जाना जाता है। सभी अनुयायी दादू वाणी को एक चालीसा के रूप में जाप करते हैं। संत दयाल महाराज के भारतवर्ष में कई पीठ और मंदिर स्थापित हैं। परंतु राजस्थान में इनके अधिक पीठ और मंदिर देखने को मिलते हैं। भारतवर्ष के राजस्थान प्रांत में स्थित जयपुर जिले के नरेना-सांभर और  बिचुन गांव के समीप स्थित “भैराणा धाम” जहां पर “दादू पालका” नामक मंदिर स्थापित है। दयाल महाराज के सभी मंदिरों में श्रेष्ठता दादू पलका धाम को ही दी जाती है। क्योंकि अंतिम दर्शन दयाल महाराज के इसी स्थान पर किए गए थे।

अनुयायियों का मानना है कि दयाल महाराज ने अपना शरीर नहीं त्यागा था शिवम भगवान ने स्वर्ग लोक से उनके लिए दिव्य पालकी भेजी थी और इसी पालकी में बैठकर दयाल महाराज देवलोक में प्रस्थान किए थे इसी वजह से भैराणा नामक स्थान को दादू पालका के नाम से जाना जाता है.

यह स्थान आज पूरे भारतवर्ष में एक तीर्थ के रूप में जाना जाता है। इस स्थान पर संत दयाल महाराज की आखिरी तिथि अर्थात अंतर्ध्यान दिवस पर बहुत बड़ा आयोजन रखा जाता है। जिसमें देश के कोने-कोने से श्रद्धालु इस शुभ अवसर  का लाभ उठाते हैं।

श्री दादू महाराज का जीवन परिचय

संत कवि दादू दयाल का जन्म फाल्गुन सुदी आठ बृहस्पतिवार संवत् 1601 (सन् 1544 ई.) को हुआ।  जन्म स्थान भारतवर्ष की पवन धरा अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ। कवि संत दादू के जीवन परिचय को लेकर इतिहासकारों में एक असमंजस तथा मतभेद की स्थिति है। क्योंकि उनके अनुयायियों का मानना है कि संत दादू का जन्म नहीं हुआ था। वह साबरमती नदी में छोटे से बालक के रूप में एक टोकरी में तैरते हुए मिले थे। वैसे भी इतिहासकारों के पास जन्म होने के रहस्य पर कोई प्रमाणित टिप्पणी नहीं है। इनके अनुयायियों की संख्या राजस्थान में ज्यादा देखने को मिलती है। कवि संत का अधिकांश जीवन राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित नरेना, सांभर आदि स्थानों पर  व्यतीत हुआ। इन स्थानों पर दयाल महाराज की पीठ स्थापित की गई है। दादू दयाल एक कवि थे और उन्होंने अपने जीवन काल में समाज कल्याण हेतु बहुत रचनाएं रची है।  इनके काव्य रचनाओं में मुख्य रचनाएँ साखी, पद्य, हरडेवाणी, अंगवधू शामिल है।

दादू पेशे से धुनिया थे और मुग़ल सम्राट शाहजहाँ (1627-58) के समकालीन थे। धीरे धीरे इनकी रुचि धार्मिक प्रवृत्ति की ओर बढ़ने लगी। इनका मत मूर्ति पूजा व सांसारिक रीति-रिवाजों से विरक्त था। ये राम नाम का जप किया करते थे और इनका मानना था, हम राम नाम के सभी दास हैं और हमें श्री राम नाम का दास ही रहना चाहिए। ऐसे ही अनुयायियों में भी राम नाम को बहुत महत्व दिया गया। राम के हम सभी दास हैं, इसलिए सभी संतो ने दास नाम को श्री दादू पंथ का मुख्य आधार माना। दादू पंथ में जो भी संत हुए उनके नाम के साथ दास जुड़ता चला  गया।

संत दयाल महाराज के जीवन का अधिकांश समय राजस्थान में व्यतीत हुआ।  चंद्रिका प्रसाद त्रिपाठी के अनुसार इनका जन्म अहमदाबाद में हुआ। 18 वर्ष की आयु तक उन्होंने अहमदाबाद में ही वास किया। 6 वर्ष तक मध्यप्रदेश में घूमते रहे। बाद में राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित नरेना जो कि सांभर क्षेत्र के पास स्थित है. संत का अधिकांश समय नरेना में व्यतीत हुआ।

इनके जीवन काल में ही संत प्रवृत्ति से आकर्षित होकर बहुत शिष्य बन चुके थे।  इनके मन में एक संप्रदाय को आरंभ करने का ख्याल आया। इन्होंने सांभर क्षेत्र मेंपरब्रह्म संप्रदायकी स्थापना की। इनके जीवन काल तक तो यह संप्रदाय इसी नाम से चलती रही। परंतु इनकी मृत्यु (अंतर्ध्यान) के बाद उनके अनुयायियों ने इस संप्रदाय का नाम बदलकरदादू पंथरख दिया। उसके बाद से संपूर्ण संप्रदायदादू पंथके नाम से विख्यात हुआ। 

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