September 26, 2021

वृतांत – Vritaant

खबर, संवाद और साहित्य

जानिए कैसे एक गांव की लड़की लवलीना बोर्गोहेन पहुंची टोक्यो ओलिंपिक में और भारत को बॉक्सिंग में कांस्य पदक दिलाया

लवलीना बोर्गोहेन असम के एक छोटे से गांव बारोमुखिया की रहने वाली है। यह गांव असम की राजधानी गुवाहाटी से 320 किमी दूर है। इस गांव में सुविधाओं की कमी है। इस गांव को शहर से जोड़ने वाले रास्ते भी ख़राब है। यहाँ पर पानी की आपूर्ति भी नहीं होती है। इसके अलावा यहाँ पर इंटरनेट सुविधा भी बहुत ही कमजोर है और इस गांव में अस्पातल भी नहीं है। 2018 के कॉमनवैल्थ गेम्स में लवलीना बोर्गोहेन का चयन होने पर उन्हें इस बात की खबर भी मीडिया द्वारा पता लगी थी। यानि इस गांव में संचार की व्यवस्था की स्थिति भी बहुत ही खराब थी लेकिन फिर भी इतनी सारी चुनौतियों के बावजूद लवलीना ने बॉक्सिंग में अपना करियर बनाया और अपना नाम बनाया। लेकिन बॉक्सिंग लवलीना की पहली पसंद नहीं था बल्कि बॉक्सिंग से पहले लवलीना ने किक बॉक्सिंग भी सीखना शुरू किया था। लवलीना ने ये सब करियर बनाने के लिए नहीं बल्कि उनकी मां का मानना था कि उनके परिवार में 3 लड़किया है और उन्हें ये सब आत्म रक्षा के लिए सीखना चाहिए। लेकिन आखिर लवलीना ने बॉक्सिंग को कैसे चुना ? एक बार लवलीना के पिता लवलीना के लिए एक अख़बार के कागज में मिठाईया लाये थे। तब लवलीना की नजर मिठाई खाते हुए कागज पर मोह्हमद अली फोटो पर पड़ी। इस फोटो को देखकर लवलीना बहुत ही प्रेरित हुई और उन्होंने बॉक्सिंग को अपना करियर चुना।

इस तरह से लवलीना बोर्गोहेन ने अपना पूरा जीवन बॉक्सिंग और खेल के लिए समर्पित कर दिया। एक बार जब स्कूल में लवलीना बॉक्सिंग की प्रैक्टिस कर रही थी तब उन्हें स्काउट्स ने देखा और उनकी प्रतिभा को पहचाना और इस तरह से ओलिंपिक पदक विजेता लवलीना का जन्म हुआ। लेकिन किसी भी निचले माधयम वर्ग के परिवार के बच्चो के लिए खेल में अपना करियर बनाना आसान नहीं है और ऐसे में लवलीना का जीवन भी ऐसी कई परेशानियों से भरा था। लवलीना के पिता का एक छोटा सा खेत है जहा पर लवलीना खुद अपने पिता की मदद करती थी लेकिन अपने बॉक्सिंग के जूनून के कारण लवलीना 3-4 घंटे दूर शहर में साइकिल से बॉक्सिंग सिखने जाती थी और वो कच्ची सड़को पर। कई बार तो लवलीना को चोट भी लग जाती थी लेकिन फिर भी लवलीना ने इस सभी चुनौतियों को पार करके बॉक्सिंग सीखी। 2018 और 2019 के विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता में लवलीना ने दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। इसके बाद आये 2020 के टोक्यो ओलंपिक्स।

पिछले साल की ओलंपिक्स की तैयारी बहुत ही जोरो से चल रही थी लेकिन फिर लॉक डाउन के लग जाने से अचानक सब बंद हो गया। ऐसे में मुक्केबाज भी आपस में लड़ नहीं सकते थे और ऐसे में करते भी क्या जब पूरी दुनिया महामारी के प्रकोप से गुजर रही है। लेकिन फिर भी लवलीना ने अपनी तैयारी नहीं छोड़ी। घर पर प्रैक्टिस के लिए आवश्यक वस्तुए नहीं होने के बाद भी लवलीना खाली गैस सिलेंडर से अपनी प्रैक्टिस करती थी।  लवलीना ने अपने जीवन में बहुद ही बड़ा मुकाम हासिल किया है लेकिन फिर भी वे अपने पिता के खेत में मदद करती है। उनके पिता का कहना है कि यह उन्हें जमीन से जुड़े रहने में मदद करता है। भारत के लिए मैडल लाने वाले खिलाडी कई परेशानियों का सामना करने के बाद यहाँ तक पहुंच पाते है। इससे हमे पता चलता है कि हमारे देश में स्पोर्ट्स की हालत किसी है और उनके रास्ते भी रुकावट ही नहीं बल्कि कई बार तो रास्ते ही नहीं होते है। लवलीना के द्वारा ओलिंपिक में मैडल जितने के कुछ घंटो बाद ही लवलीना के गांव में सड़क बनवाने का काम शुरू हो गया। यानि ऐसी स्थिति को देखकर एक ही सवाल हमारे मन में आता है कि क्या देश के गावो में पक्की सड़के बनवाने के लिए पहले ओलिंपिक में मैडल जितना जरुरी है ? यदि सरकार द्वारा ऐसे काम पहले ही पूर्ण कर लिए जाये तो देश में कितने प्रतिभावान खिलाडी होंगे जो देश के लिए मैडल लाने की योग्यता रखते है। ऐसे में अब सरकार को भी इस बारे में सोचने की आवश्यकता है।

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