September 26, 2021

वृतांत – Vritaant

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जानिए कैसे गांव के लोगो ने भुज की लड़ाई में पाकिस्तान को हराने में भारतीय सेना की मदद की थी

क्या गांव के लोग भारत को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीता सकते है ? यह सुनकर आपको आश्चर्य होगा और आपको लगेगा कि ये कैसे मुमकिन है ? लेकिन ऐसा सच में हो भारत में हो चूका है। यह कहानी है भुज की और इस कहानी पर बॉलीवुड में भुज – द प्राइड ऑफ़ इंडिया नाम से फिल्म भी आ रही है। आखिर भुज की यह लड़ाई कैसे इतनी महत्वपूर्ण है और कैसे आम जनता ने भारतीय सेना की पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जितने में मदद की। साल 1971 की लड़ाई भारत के लिए ही नहीं बल्कि पुरे एशिया के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था क्योकि इस लड़ाई को जीतकर भारत ने बांग्लादेश को आजादी दिलाई थी। इस लड़ाई में लगभग 13 हजार पाकिस्तानी फौजियों ने भारतीय सेना के आगे हथियार दाल दिए थे। यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी संख्या में किसी सेना द्वारा आत्म समर्पण किया गया था। इस लड़ाई में भारत की तीनो सेनाये एक साथ लड़ी थी। लेकिन आखिर यह लड़ाई क्यों हुई ?

बांग्लादेश पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था और दोनों पाकिस्तान की संस्कृति में बहुत ही ज्यादा अंतर था। लगभग 30 लाख बांग्लादेशी लोग पाकिस्तानी सैनिको के हाथो मारे गए थे। इस हिंसा के खिलाफ भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र में अपनी आवाज़ उठायी थी और इसे रोकने के लिए जरुरी कदम उठाने को कहा था ताकि बड़ी लड़ाई होने से रोका जा सके। लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने कोई भी सख्त कदम नहीं उठाये और यह हिंसा बड़े युद्ध में बदल गया। पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत के 12 वायुसेना की हवाई पट्टियों पर हवाई हमला कर दिया। यह हमला अचानक किया गया ताकि भारत को कोई भी कदम उठाने से पहले ही रोका जा सके। यह बात हमेशा सही साबित हुई है कि किसी भी देश को युद्ध में जीत दिलाने में वायुसेना की अहम् भूमिका होती है और यह हमेशा से देखा गया है कि जिसकी वायुसेना ज्यादा ताकतवर होती है वही युद्ध के परिणाम को नियंत्रित कर पाता है। ऐसे ही पाकिस्तानी वायुसेना ने हमारी वायुसेना की  हवाई पट्टियों पर हवाई हमला करके हमारी वायुसेना को कमजोर करने की कोशिश की। भुज में पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा 14 बम गिराए गए जिसमे हमारे लड़ाकू विमान तो बच गए लेकिन सभी हवाई पट्टियां तबाह हो गयी।

ऐसे में बिना हवाई पट्टियों के लड़ाकू विमान किसी काम के नहीं थे। अब भारतीय सेना के आगे हवाई पट्टी को फिर से ठीक करने की जिम्मेदारी थी लेकिन सभी सैनिको को मिलाकर केवल सेना के पास 110 लोग ही थे और इस काम को सिर्फ कुछ ही घंटो में पूरा करना था। लेकिन इस काम को अंजाम देने के लिए स्क्वाड्रन लीडर विजय कर्णिक सर ने एक निर्णय लिया। भुज के पास ही माधापुर नाम का एक गांव था। उन्होंने गांव के लोगो से हवाई पट्टी को फिर से ठीक करने के लिए मदद मांगी और उन्हें समझाया कि कैसे ये काम बहुत ही ज्यादा जरुरी है।  गांव की लगभग 300 महिलाये बिना हिचकिचाए हवाई पट्टियों को सही करने के काम में लग गयी। यह काम पूरी तरह से छिपकर किया गया ताकि पाकिस्तानी सेना को पता न चल सके। गांव की औरतो ने हरी साड़िया पहनकर काम किया ताकि वे किसी भी किसी भी यंत्र में दिखाई न दे सके। इसके अलावा हवाई  पट्टी को छिपाने के लिए गाय के गोबर को भी काम में लिया गया और गांव की औरतो की मदद से केवल 72 घंटे में ही हवाई पट्टी तैयार हो गयी।

इन सभी औरतो को पूरी तरह से खबर थी कि हवाई पट्टी पर उनकी जान को खतरा है क्योकि पाकिस्तानी सेना भारतीय वायु सेना की हवाई पट्टियों पर लगातार हमला कर रही थी। ये औरते कोई पहले से प्रशिक्षित नहीं थी फिर भी इन्होने अपने बच्चो को पड़ोसियों के पास छोड़ कर इस काम को पूरा करने में मदद की। इन्हे ये भी उम्मीद नहीं थी कि वे वापस घर जा पाएंगे या नहीं। लेकिन इन सभी महिलाओ ने अपनी जान की फ़िक्र न करते हुए भारतीय सेना की मदद की और इस हवाई पट्टी की मदद से हमारी वायु सेना फिर से हमारी सीमाओं की सुरक्षा में तैनात हो गयी। इस तरह से गांव की महिलाओ और लोगो ने भारतीय सेना को यह युद्ध जितने में मदद की। यह युद्ध सिर्फ 13 दिन तक चला और यह इतिहास का सबसे कम समय तक चलने वाला युद्ध था।

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